दशहरे पर अनूठा नजारा, DJ और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच हुई दशानन रावण की पूजा, 260 साल पुरानी है परंपरा


देशभर में जहां विजयादशमी पर बुराई के प्रतीक रावण का पुतला जलाकर अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश दिया जाता है। वहीं मध्यप्रदेश के सतना जिले में एक ऐसी अनूठी परंपरा देखने को मिलती है, जो लोगों को हैरान कर देती है। कोठी थाना परिसर में रावण का दहन नहीं, बल्कि उसकी पूजा की जाती है। डीजे और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच पूजा का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु इस परंपरा में शामिल होते हैं।
पुजारी रमेश मिश्रा का कहना है कि मंदिर में स्थापित रावण की प्रतिमा को स्थानीय मान्यताओं के अनुसार 260 साल से अधिक पुराना बताया जाता है। दशहरे के अवसर पर यहां रावण के पुतले का दहन करने के बजाय उसकी पूजा-अर्चना की जाती है। डीजे और ढोल-नगाड़ों के साथ होने वाली पूजा के दौरान माहौल उत्साहपूर्ण नजर आता है।
5 पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपरा
सतना जिले की यह परंपरा कोठी की विशिष्ट पहचान बन चुकी है। यहां रावण की पूजा की परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। रमेश मिश्रा का कहना है कि 5 पीढ़ियों से लोग इस परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं। जिसकी वजह से दशहरे के अवसर पर कोठी की चर्चा अन्य स्थानों से अलग होती है। जहां एक ओर रावण दहन के आयोजन होते हैं, वहीं दूसरी ओर यहां रावण की प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना की जाती है ।
“रावण की पूजा” अब कोठी की पहचान
विजयादशमी का पर्व भगवान श्रीराम की ओर से रावण पर विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में रावण के पुतले जलाए जाते हैं। लेकिन कोठी में दशानन की पूजा लोगों के लिए कौतूहल का विषय रहती है। यहां रावण की प्रतिमा और उससे जुड़ी मान्यताएं क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानी जाती हैं।
कोठी की यह परंपरा अपने आप में अनूठी है, रावण के चरित्र और उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं को लेकर देशभर में अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं। यहाँ स्थापित रावण की प्राचीन प्रतिमा और उसकी पूजा की परंपरा इस क्षेत्र को एक अलग पहचान देती है। डीजे और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच होने वाली पूजा इस अनूठी परंपरा को और भी खास बना देती है।
सतना से मो. फारूख की रिपोर्ट











