मिडिल ईस्ट तनाव के बीच कच्चा तेल 100 डॉलर के करीब, डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर

मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और तेल ठिकानों पर हमलों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। इसी के चलते भारतीय रुपया भी डॉलर के मुकाबले दबाव में आ गया और कारोबार के दौरान अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया।
कारोबार के दौरान रुपया एक समय डॉलर के मुकाबले 92.3575 के स्तर तक गिर गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। हालांकि दिन के अंत में कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी नरमी आने से रुपये ने कुछ नुकसान की भरपाई की और यह 92.19 प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ। यह पिछले कारोबारी सत्र की तुलना में लगभग 0.16 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रुपये में गिरावट का सिलसिला तेज होता है तो भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है, ताकि मुद्रा में अधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित किया जा सके।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार में भी भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत एक समय 101.6 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। बाद में इसमें कुछ गिरावट आई और यह लगभग 96.87 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करती नजर आई।
यह तेजी मुख्य रूप से अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण आई है। इस संघर्ष का असर पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र में दिखाई दे रहा है, जिससे तेल आपूर्ति को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ गई है।
तेल की कीमतों में उछाल और भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक शेयर बाजारों पर भी पड़ा है। एशियाई शेयर बाजारों में करीब एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि भारत का प्रमुख शेयर बाजार सूचकांक निफ्टी 50 भी लगभग इतनी ही गिरावट के साथ कारोबार करता दिखाई दिया। यूरोपीय बाजारों में भी दबाव देखने को मिला और अमेरिकी बाजारों की शुरुआत भी कमजोर रहने के संकेत मिले।
विशेषज्ञों का कहना है कि जिन देशों की अर्थव्यवस्था तेल आयात पर ज्यादा निर्भर होती है, उनकी मुद्राओं पर ऐसे हालात का अधिक प्रभाव पड़ता है। भारत भी दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातक देशों में शामिल है, इसलिए युद्ध शुरू होने के बाद से रुपये में डॉलर के मुकाबले एक प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की जा चुकी है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो इसका असर भारत की आर्थिक वृद्धि और महंगाई दोनों पर पड़ सकता है। इससे महंगाई बढ़ने और विकास दर धीमी होने की आशंका भी बढ़ सकती है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल विदेशी मुद्रा बाजार की दिशा तय करने में ऊर्जा कीमतें सबसे अहम भूमिका निभाएंगी। इसके साथ ही बाजार की नजर फरवरी महीने के महंगाई आंकड़ों पर भी बनी हुई है, जिनसे आगे की आर्थिक स्थिति के संकेत मिल सकते हैं।











