वोकल फॉर लोकल: 200 साल पुरानी परंपरा को सहेज रहे नीमच की ग्वालटोली के 170 परिवार, 65 लाख दीपक महानगरों में भेजे


दीपावली पर जब देश के बड़े-बड़े महानगरों में घरों की मुंडेरों पर मिट्टी के दीपक जलेंगे, तो उनमें एक बड़ी चमक मध्य प्रदेश के नीमच की मिट्टी की होगी। शहर के ग्वालटोली क्षेत्र में इस बार मौसम साफ रहने से कारीगरों को दो महीने का अतिरिक्त समय मिला, जिससे रिकॉर्ड 85 लाख मिट्टी के दीये तैयार किए गए हैं। इनमें से 65 लाख से अधिक दीपक रतलाम, भोपाल, इंदौर-महू के साथ-साथ राजस्थान (उदयपुर, बाड़मेर), गुजरात और दिल्ली-मुंबई तक भेजे जा चुके हैं। हालांकि, इस बंपर उत्पादन और देशभर में भारी मांग के बावजूद इन दीपों को गढ़ने वाले कारीगरों की अपनी दीपावली आर्थिक तंगी और प्रशासनिक अड़चनों के साए में है।
चार तरह की मिट्टी और 15 दिन की प्रक्रिया से आती है मजबूती
नीमच के मिट्टी के दीपक अपनी बेजोड़ मजबूती और सुंदर फिनिशिंग के लिए देशभर में पसंद किए जाते हैं। वरिष्ठ कारीगर चोथेलाल प्रजापति और पर्यावरणविद देवेंद्र प्रजापति बताते हैं कि इन दीपों को बनाने के लिए 40 किलोमीटर दूर छोटी सादड़ी और चीताखेड़ा की खदानों से पीली, लाल, काली और भूरी—यानी चार प्रकार की विशेष मिट्टी लाई जाती है। महिला कारीगर ललिता प्रजापति और मुकेश प्रजापति के अनुसार, इस मिट्टी को पानी में घोलकर छलनी से छाना जाता है, ताकि कंकड़-पत्थर निकल जाएं और मक्खन जैसी महीन मिट्टी मिले।
इसके बाद इसमें गोबर की राख और बुरादा मिलाकर पैरों से गूंथा जाता है और बार-बार पटका जाता है। करीब 15 दिनों की इस कठिन प्रक्रिया के बाद मिट्टी के पिंड तैयार होते हैं, जिन्हें ‘विष्णु चक्र’ कहे जाने वाले चाक पर चढ़ाकर सुडौल आकार दिया जाता है। कच्चे दीयों की नमी (आर्द्रता) बनाए रखने और फिनिशिंग बचाने के लिए इन्हें तिरपाल के नीचे कतारबद्ध सुखाया जाता है और अंत में भट्टी में पकाया जाता है।
चमक के पीछे का दर्द: मिट्टी लाने पर जुर्माना, बाजार में गिरे दाम
ग्वालटोली में दीये बनाने का यह काम एक मिनी उद्योग की तरह चलता है, जिसमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सहित पूरा परिवार दिन-रात जुटता है। लेकिन इस बार कारीगरों के सामने दोहरी चुनौती है, महिला कारीगर ललिता प्रजापति ने पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि जब वे चीताखेड़ा की खदानों से ट्रैक्टर में मिट्टी लेने जाते हैं, तो उन्हें रोका जाता है। कई बार ट्रैक्टर जब्त कर लिए जाते हैं, जो 8-8 दिन तक थाने में खड़े रहते हैं और 50 हजार रुपए तक की व्यवस्था कर ट्रैक्टर छुड़ाना पड़ता है।
कारीगर पिंटू प्रजापति और मुकेश प्रजापति के मुताबिक, इस साल थोक बाजार में दीयों के दाम गिर गए हैं। पिछले साल जहां 700 रुपए प्रति हजार नग का भाव मिला था, वहीं इस बार कारीगरों को 500 से 600 रुपए प्रति हजार में ही दीये बेचने पड़ रहे हैं। एक हजार दीये बनाने में दो लोगों की मेहनत के साथ मिट्टी और पकाई का खर्च जुड़ता है, जिससे दिनभर की दिहाड़ी भी नहीं निकल पा रही है।
200 साल पुरानी परंपरा विलुप्त होने का डर
ग्वालटोली के बुजुर्ग मन्नालाल प्रजापति बताते हैं कि करीब 200 साल पहले अंग्रेज उत्तर प्रदेश से प्रजापति समाज के परिवारों को नीमच लाए थे। आज चौथी पीढ़ी के 170 से अधिक परिवार इस पुश्तैनी काम में जुटे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उज्जैन में हुए भव्य आयोजन के लिए भी यहीं से दीपक भेजे गए थे। लेकिन कारीगर मुकेश प्रजापति का कहना है कि उचित दाम और सरकारी मदद न मिलने से अब उनके बच्चे इस पारंपरिक काम से विमुख हो रहे हैं। कारीगरों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि उन्हें मिट्टी लाने में छूट और काम के लिए उचित भूमि व आर्थिक सहयोग दिया जाए, अन्यथा ‘वोकल फॉर लोकल’ का यह पारंपरिक हुनर आने वाले समय में विलुप्त हो जाएगा।
कमलेश सारड़ा की रिपोर्ट











