दमोह में निजी भूमि पर नए SDM दफ्तर का निर्माण, कलेक्टर ने जांच के दिए निर्देश, दोषी अधिकारियों से वसूली जाएगी खर्च राशि


दमोह: मध्यप्रदेश के दमोह जिले से सरकारी निर्माण में बड़ी लापरवाही का मामला सामने आया है। जहां करीब 1 करोड़ 35 लाख रुपए की लागत से स्वीकृत एसडीएम कार्यालय भवन का निर्माण निजी जमीन पर करा दिया गया। आरोप है कि भवन निर्माण शुरू होने से पहले भूमि के स्वामित्व और जरूरी दस्तावेजों का उचित सत्यापन नहीं किया गया था।
बता दें कि यह मामला जिले की तेंदूखेड़ा तहसील का है। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा की जबलपुर हाईकोर्ट तक जा पहुंचा। इतना ही नहीं, कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने इस संबंध में कार्रवाई करते हुये विवादित भूमि पर निर्माण कार्य एवं किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप पर रोक लगाते हुए संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए हैं।
अब सवाल यह उठता है कि सरकारी भवन का करीब 30-40 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था। तो इसमें खर्च हुई सरकारी राशि का हिसाब कौन देगा? इस पर कलेक्टर ने निर्माण में खर्च हुई शासकीय राशि की जांच कर दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों से ही वसूली के निर्देश दिए गए हैं।
बिना दस्तावेज सत्यापन के कैसे शुरू हुआ निर्माण कार्य?
बता दें कि तेंदूखेड़ा के खसरा नंबर 170, रकबा 0.2590 हैक्टेयर भूमि से संबंधित है। राजस्व अभिलेखों के अनुसार यह जमीन निजी भू-स्वामी के नाम दर्ज बताई गई है और अब इसी जमीन पर नए एसडीएम दफ्तर का निर्माण कार्य भी शुरू करा दिया गया। आरोप है कि आवश्यक दस्तावेजों और एनओसी की जांच किए बिना ही निर्माण प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई। खास बात तो यह है कि सरकारी भवन का निर्माण किसी प्लॉट या बंजर जमीन पर नहीं, बल्कि खेती की जमीन पर शुरू कर दिया। कलेक्टर ने जब इसकी जांच के आदेश दिये तो सामने आया कि सच में सरकारी भवन का निर्माण कार्य निजी जमीन पर कराया गया है। इसके बाद सवाल उठता है कि किन दस्तावेजों के आधार पर इस कार्य शुरू कराया गया था।
इस मामले में जमीन के मालिक ने 3 दिसंबर 2025 को कलेक्टर कार्यालय में शिकायत देकर एक आपत्ति दर्ज कराई थी। लेकिन कलेक्टर कार्यालय की ओर से भी समस्या का कोई निराकरण नहीं हुआ। इसके बाद मालिक ने हाईकोर्ट में न्याय की गुहार लगाई। इस संबंध में हाईकोर्ट ने मार्च 2026 को कलेक्टर को मामले में तय समय-सीमा में निराकरण करने के निर्देश दिए थे।
इसके बाद मामला अवमानना याचिका तक पहुंच गया। अवमानना की कार्रवाई के बाद जिला प्रशासन ने राजस्व प्रकरण में सुनवाई कर मामले के निराकरण की प्रक्रिया तेज की। सुनवाई के बाद कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने 12 अगस्त को स्पीकिंग ऑर्डर जारी किया। इसके बाद 27 अगस्त को विवादित भूमि और निर्माण से जुड़े मामले में आगे की कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए।
निर्माण से पहले भूमि स्वामित्व और दस्तावेजों के सत्यापन पर सवाल
जानकारी के अनुसार, निजी भूमि पर किसी भी प्रकार के निर्माण या हस्तक्षेप पर रोक लगाने के साथ ही संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। अब यह सवाल उठ रहा है कि सरकारी भवन के निर्माण के लिए निजी भूमि का चयन किस आधार पर किया गया और निर्माण शुरू होने से पहले भूमि के स्वामित्व तथा आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन क्यों नहीं किया गया? निजी भूमि पर निर्माण शुरू किए जाने के कारण अब तक इस कार्य पर खर्च की गई शासकीय राशि भी जांच के दायरे में आ गई है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि भूमि चयन, दस्तावेजों के सत्यापन और निर्माण की प्रक्रिया में किन स्तरों पर लापरवाही हुई।











