मृत्यु की आहट बदल देती है जीवन, समय तो है लेकिन गारंटी कितनी?

आज अचानक खबर मिली कि हमारे एक पत्रकार साथी सिर्फ 47 वर्ष की उम्र में कल इस दुनिया से चले गए. खबर पढ़कर मन कुछ देर के लिए रुक-सा गया. 47 साल कोई ऐसी उम्र नहीं लगती जब हम किसी के जाने की खबर की उम्मीद करें. हम मानकर चलते हैं कि अभी तो बहुत समय है. अभी काम करना है. अभी कुछ लोगों से मिलना है. किसी को फोन करना है. कुछ बातें कहनी हैं. शायद किसी से माफी मांगनी है. शायद किसी को धन्यवाद देना है, लेकिन जिंदगी हमारी बनाई हुई सूची के हिसाब से नहीं चलती. कुछ महीने पहले मुझे भी जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी को बहुत करीब से महसूस करने का ऐसा अनुभव हुआ था. उसके बाद मृत्यु मेरे लिए केवल किसी और के बारे में सुनाई देने वाली खबर नहीं रही. उसने जीवन को देखने का मेरा तरीका बदल दिया.

हम सब जानते हैं कि एक दिन हमारा दिल रुक जाएगा. दिमाग काम करना बंद कर देगा. जिस घर में हमारी आवाज गूंजती है, वहां एक दिन सन्नाटा होगा और जिन लोगों ने हमें प्यार किया होगा, वो शायद धीरे से कहेंगे, ‘वह चला गया’. लेकिन यह बात जानना और इसे भीतर से समझना दो अलग चीजें हैं. हम रोज मृत्यु के बारे में सुनते हैं, फिर भी सुबह उठकर ऐसे जीते हैं जैसे हमारे पास समय जमा है. जैसे आज का काम कल किया जा सकता है, आज की मुलाकात अगले महीने हो सकती है और आज कही जाने वाली बात कभी भी कही जा सकती है. शायद मृत्यु का सबसे बड़ा डर यह नहीं है कि जीवन खत्म हो जाएगा. उससे बड़ा डर यह है कि कहीं जीवन खत्म होने से पहले हमें यह पता न चले कि हमने उसे पूरी तरह जिया ही नहीं.

विज्ञान साबित नहीं कर पाया चेतना का रहस्य

हमारे दिमाग के भीतर एक पूरी दुनिया रहती है. मां का चेहरा. बचपन की कोई आवाज. किसी पुराने दोस्त की हंसी. किसी से हुई एक छोटी-सी बातचीत. कोई अपमान जिसे हम भूलना चाहते हैं, लेकिन भूल नहीं पाए. किसी अजनबी की छोटी-सी मदद जिसे उसने शायद उसी दिन भुला दिया, लेकिन हमने नहीं भुलाया. हमारी खुशियां, डर, इच्छाएं, पछतावे, सीख और अनुभव मिलकर हमारे भीतर एक ऐसी कहानी बनाते हैं जिसे दुनिया पूरी तरह देख भी नहीं सकती. विज्ञान आज दिमाग, स्मृति और चेतना को समझने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अभी तक विज्ञान ने यह साबित नहीं किया है कि हमारी व्यक्तिगत यादें या हमारी चेतना शरीर की मृत्यु के बाद उसी रूप में जीवित रहती हैं. शरीर में मौजूद ऊर्जा अलग-अलग रूपों में बदलती है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि हमारा व्यक्तिगत मन या चेतना भी ऊर्जा के रूप में आगे चलती रहती है. यहां सबसे ईमानदार उत्तर शायद यही है: हमें नहीं मालूम.

आखिरी सांस के बाद क्या होता है?

शायद ‘हमें नहीं मालूम’ कहना बहुत बड़ी समझदारी है. मनुष्य हजारों वर्षों से यह जानना चाहता रहा है कि आखिरी सांस के बाद क्या होता है. अलग-अलग सभ्यताओं और परंपराओं ने अलग-अलग उत्तर दिए हैं. किसी ने आत्मा की बात की, किसी ने पुनर्जन्म की, किसी ने दूसरी दुनिया की, किसी ने शून्य की. लेकिन इन सभी सवालों के बीच एक और सवाल छिपा रह गया: जो अभी सांस ले रहा है, वह अपनी जिंदगी के साथ क्या कर रहा है?
कल्पना कीजिए, दो लोग एक कमरे में बैठे हैं. एक कहता है, ‘मौत के बाद कुछ नहीं है’. दूसरा कहता है, ‘कुछ तो जरूर होगा’.

दोनों बहस करते रहते हैं. तभी एक बुज़ुर्ग उनसे पूछता है, ‘तुम दोनों यह तय करने में इतने व्यस्त हो कि कल क्या होगा, लेकिन क्या तुमने देखा कि आज क्या हो रहा है?’ शायद यही हमारी भूल है. हम उस दरवाज़े के पीछे झांकना चाहते हैं जिसे अभी किसी ने नहीं खोला, लेकिन हमारे सामने खुली खिड़की से आती रोशनी को देखना भूल जाते हैं.

हमें डरा सकती है मृत्यु की याद

मृत्यु की याद हमें डरा भी सकती है और जगा भी सकती है. कुछ महीने पहले जब मैंने जीवन को बहुत करीब से एक अलग नजर से देखा, तो समय का अर्थ बदल गया. एक साधारण सुबह भी साधारण नहीं लगी. किसी से हुई बातचीत थोड़ी अधिक महत्वपूर्ण लगी. यह महसूस हुआ कि जिंदगी का मूल्य केवल बड़ी घटनाओं में नहीं होता. एक फोन कॉल भी जीवन का हिस्सा है. किसी की बात ध्यान से सुनना भी जीवन का हिस्सा है. किसी को बिना किसी कारण धन्यवाद देना भी जीवन का हिस्सा है. किसी पुराने गुस्से को छोड़ देना भी जीवन का हिस्सा है. हम अक्सर सोचते हैं कि जीवन में कुछ बड़ा होने पर ही जीवन सार्थक होगा. शायद उलटा सच है.

हर दिन आखिरी दिन की तरह जीना चाहिए?

जीवन की बड़ी कीमत उसके छोटे-छोटे क्षणों में छिपी होती है, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि हर दिन ऐसे जीना चाहिए जैसे आज आखिरी दिन है. ऐसा करने से जीवन भी एक प्रदर्शन बन जाएगा. हमें हर सुबह कोई महान काम करने की जरूरत नहीं. कभी एक बच्चा जमीन पर बैठकर कागज की नाव बनाता है और उसमें इतना डूब जाता है कि उसे दुनिया की कोई चिंता नहीं रहती. शायद वह उस क्षण जीवन को हमसे बेहतर समझ रहा होता है. जीवन का अर्थ हर पल को असाधारण बनाना नहीं है. उसका अर्थ है साधारण पल को भी अनदेखा न करना.

शायद अब सवाल यह नहीं रह जाता कि ‘मेरी मृत्यु के बाद मेरा क्या बचेगा?’ उससे पहले हमें पूछना चाहिए, ‘मेरे रहते हुए मैं क्या छोड़ रहा हूं?’ पैसा पीछे रह जाएगा. घर पीछे रह जाएगा. पद पीछे रह जाएगा, लेकिन किसी को दिया हुआ आत्मविश्वास रह सकता है. किसी दुखी व्यक्ति को दिया हुआ समय रह सकता है. किसी बच्चे को सिखाई हुई करुणा आगे जा सकती है. किसी अकेले इंसान को दिया हुआ साथ उसकी पूरी जिंदगी में कहीं न कहीं जीवित रह सकता है. शायद मनुष्य की सबसे बड़ी विरासत वह नहीं होती जो वह जमा करके जाता है, बल्कि वह होती है जो वह दूसरों के भीतर छोड़ जाता है.

‘आज’ ही सबसे बड़ी संपत्ति

आज 47 साल की उम्र में एक पत्रकार साथी के चले जाने की खबर ने फिर वही बात याद दिलाई है. कुछ महीने पहले जीवन ने मुझे भी यह आईना दिखाया था. हम सबके पास समय है, लेकिन किसी के पास समय की गारंटी नहीं है. हमारे पास आज है. यही सबसे बड़ी संपत्ति है.

किसी को फोन करना है तो करिए. किसी से कुछ कहना है तो कहिए. किसी को माफ करना है तो कीजिए. किसी को गले लगाना है तो देर मत कीजिए और सबसे जरूरी, अपने जीवन को केवल गुजरने मत दीजिए. उसे देखिए. समझिए. महसूस कीजिए, क्योंकि हमें यह नहीं मालूम कि हमारी आखिरी सुबह कब होगी, लेकिन इतना जरूर मालूम है कि आज की सुबह अभी हमारे पास है. सवाल सिर्फ इतना है: हम इसके साथ क्या करने वाले हैं?

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पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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