अरावली की परिभाषा पर फिर मंथन, 100 मीटर नियम पर रोक जारी, अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र में अवैध खनन पर सख्ती दिखाते हुए नई विशेषज्ञ समिति गठित करने की तैयारी शुरू की है. अदालत का कहना है कि अरावली जैसी संवेदनशील पहाड़ी श्रृंखला पर किसी भी लापरवाही का असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर जारी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक बार महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मुद्दा मात्र तकनीकी नहीं, बल्कि देश के पर्यावरण भविष्य से जुड़ा हुआ है। अदालत ने साफ निर्देश दिया कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अवैध खनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, क्योंकि ऐसे खनन के परिणाम “अपूर्णीय और दूरगामी” होते हैं, जिन्हें बाद में सुधारना संभव नहीं होता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि अरावली की वैज्ञानिक और स्पष्ट परिभाषा तय करने के लिए एक हाई‑पावर्ड कमेटी बनाई जाएगी। इस समिति में पर्यावरण, वानिकी, भू‑विज्ञान और संबंधित क्षेत्रों के स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल होंगे।

कोर्ट ने अपने उस पुराने फैसले पर लगी रोक को भी बढ़ा दिया है, जिसमें 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली मानने की सिफारिश थी। पर्यावरण मंत्रालय की समिति की इस सिफारिश को अदालत ने पहले ही पुनर्विचार योग्य बताते हुए स्थगित कर दिया था। अदालत का मानना है कि यह मुद्दा संवेदनशील है और इसे जल्दबाजी में तय नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान एक वकील ने राजस्थान के कई क्षेत्रों में लगातार चल रहे अवैध खनन का मुद्दा उठाया। इस पर न्यायालय ने राजस्थान सरकार के वकील को तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया और कहा कि अरावली जैसा पर्यावरणीय क्षेत्र किसी भी प्रकार की लापरवाही का भार नहीं उठा सकता। अदालत ने साथ ही कहा कि अवैध खनन भविष्य की पीढ़ियों के पर्यावरण अधिकारों को सीधे प्रभावित करता है, इसलिए न्यायालय इस पूरे मामले में सभी पहलुओं की गहराई से जांच करेगा।