हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर मनाई जाती है वसंत पंचमी, अमीर खुसरो की गुरु भक्ति की कहानी आज भी जीवित

दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह पर वसंत पंचमी का पर्व पिछले 700 वर्षों से मनाया जा रहा है। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि गुरु और शिष्य के अटूट प्रेम और भक्ति का प्रतीक भी है।

14वीं शताब्दी में सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने प्रिय भांजे की मृत्यु के बाद गहरे शोक में डूब गए थे। उनके चेहरे से रौनक चली गई थी और वे महीनों तक उदास रहे। इस स्थिति को देखकर उनके सबसे प्रिय शिष्य और प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो ने उन्हें फिर से मुस्कुराते हुए देखने के लिए कदम उठाया।

अमीर खुसरो ने देखा कि कुछ हिंदू ग्रामीण पीले वस्त्र पहनकर और हाथों में सरसों के फूल लिए वसंत पंचमी मनाने जा रहे हैं। खुसरो ने भी पीले कपड़े पहने, फूल उठाए और गीत गाते हुए नाचने लगे। अपने गुरु के सामने यह नृत्य और भक्ति देखकर हजरत निजामुद्दीन औलिया का दुख पिघल गया और वे मुस्कुरा उठे। इसी दिन से दरगाह पर वसंत पंचमी मनाने की परंपरा शुरू हुई।

आज भी दरगाह पर वसंत पंचमी के दिन पूरा परिसर पीले फूलों और चादरों से सजाया जाता है। कव्वालियों के माध्यम से अमीर खुसरो द्वारा रचित वसंत गीत और ‘कौल’ गाए जाते हैं। यह पर्व धर्म और जाति की दीवारें तोड़कर इंसानी मोहब्बत और आध्यात्मिक जुड़ाव की मिसाल प्रस्तुत करता है।