लोन फ्रॉड केस में अनिल अंबानी का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा, कहा- बिना इजाजत देश नहीं छोड़ूंगा

रिलायंस एडीएजी ग्रुप के 40 हजार करोड़ रुपये के कथित लोन धोखाधड़ी मामले में उद्योगपति अनिल अंबानी ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है. उन्होंने अदालत को लिखित में भरोसा दिया है कि वह बिना पूर्व अनुमति के देश छोड़कर नहीं जाएंगे और सीबीआई-ईडी की जांच में पूरा सहयोग करेंगे.

रिलायंस एडीएजी ग्रुप से जुड़े 40 हजार करोड़ रुपये के कथित लोन फ्रॉड मामले में उद्योगपति अनिल अंबानी ने सुप्रीम कोर्ट में एक अहम हलफनामा दाखिल किया है. उन्होंने देश की सर्वोच्च अदालत को स्पष्ट भरोसा दिलाया है कि वह पूर्व अनुमति के बिना भारत से बाहर नहीं जाएंगे. साथ ही, उन्होंने सीबीआई और ईडी की चल रही जांच में पूरा सहयोग करने का वादा भी किया है.

अंबानी ने अपने हलफनामे में 4 फरवरी को उनके वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी द्वारा दिए गए वचन की पुष्टि की है. उन्होंने अदालत को बताया कि जुलाई 2025 में जांच शुरू होने के बाद से उन्होंने देश नहीं छोड़ा है. उनका फिलहाल विदेश जाने का कोई इरादा नहीं है. अंबानी ने यह भी साफ किया कि वह 26 फरवरी 2026 को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के समन पर पेश होकर जांच प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे.

40 हजार करोड़ का घोटाले का है मामला

यह पूरा मामला ईएएस सरमा की उस जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें एडीएजी कंपनियों द्वारा 40,000 करोड़ रुपये से अधिक के लोन डिफॉल्ट की कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की गई है. 4 फरवरी को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने जांच एजेंसियों की सुस्ती पर कड़ी नाराजगी जताई थी. अदालत ने ईडी को विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाने और सीबीआई को हर बैंक की शिकायत पर अलग एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया

इस पूरे मामले में सीधे तौर पर आम जनता की गाढ़ी कमाई दांव पर लगी है. रिलायंस कम्युनिकेशंस और उसकी ग्रुप कंपनियों ने 2013 से 2017 के बीच एसबीआई के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम से 31,580 करोड़ रुपये का भारी-भरकम लोन लिया था. एसबीआई के 2020 के फोरेंसिक ऑडिट में फर्जी कंपनियों, सर्कुलर ट्रांजेक्शन और शेल फर्मों के जरिए हजारों करोड़ के हेरफेर का साफ खुलासा हुआ था.

जनता के पैसे की इस बड़ी हेराफेरी के बावजूद, बैंक ने करीब पांच साल की देरी से अगस्त 2025 में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई. यह देरी बैंकिंग सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है. सुप्रीम कोर्ट ने अब भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत मंजूरी का इंतजार किए बिना बैंक अधिकारियों की मिलीभगत की गहराई से जांच के आदेश दिए हैं, ताकि असल दोषियों तक पहुंचा जा सके.

एफआईआर में आधी-अधूरी सच्चाई

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण और प्रणव सचदेवा ने अदालत में दलील दी कि सीबीआई की एफआईआर में केवल 2,929 करोड़ रुपये के नुकसान का जिक्र है, जो असल घोटाले का एक बहुत छोटा हिस्सा है. इसमें फर्जी खातों से पैसे निकालने, लोन की एवरग्रीनिंग और उन कंपनियों के इस्तेमाल जैसे बड़े अपराधों को नजरअंदाज किया गया है, जिनका अपने पते पर कोई वजूद ही नहीं मिला. जांच को पूरी तरह से निष्पक्ष बनाने के लिए बैंक अधिकारियों को जवाबदेह ठहराना बेहद जरूरी है.

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