रूस से तेल खरीदने पर भारत का दोटूक रुख, कहा – ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी की इजाजत नहीं चाहिए

मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ-साथ भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। इसी बीच अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीदने को लेकर दी गई ‘छूट’ की बात पर भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे किसी देश की अनुमति की आवश्यकता नहीं है और वह रूस से तेल खरीद जारी रखेगा।
सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत ने अपने ऊर्जा व्यापार को जारी रखा था। फरवरी 2026 में भी रूस भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। भारत का कहना है कि रियायती दरों पर मिलने वाले रूसी तेल और घरेलू रिफाइनरियों की मांग के कारण यह आयात लगातार बढ़ा है। साथ ही भारत रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक भी है, जिससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत बनी हुई है।
दूसरी ओर मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने वैश्विक तेल आपूर्ति को बड़ा झटका दिया है। अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ कार्रवाई और उसके जवाबी हमलों के कारण क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है। इस संघर्ष का असर समुद्री मार्गों पर भी पड़ा है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लगभग बंद होने की स्थिति में पहुंच गया है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और एलएनजी आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है।
तेल आपूर्ति में बाधा का असर भारत में भी दिखाई देने लगा है। घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में लगभग सात प्रतिशत तक बढ़ोतरी की गई है, जिससे आम उपभोक्ताओं की रसोई का बजट प्रभावित हो सकता है। सरकार ने रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए हैं, ताकि घरेलू जरूरतों को पूरा किया जा सके।
मिडिल ईस्ट से आपूर्ति प्रभावित होने के बाद रूसी तेल की मांग में भी तेजी आई है। जो रूसी कच्चा तेल पहले ब्रेंट क्रूड के मुकाबले 10 से 13 डॉलर के डिस्काउंट पर मिल रहा था, अब उसके लिए भारतीय रिफाइनरियों को अतिरिक्त कीमत चुकानी पड़ रही है। मार्च और अप्रैल में डिलीवरी वाले तेल के लिए ब्रेंट क्रूड के मुकाबले लगभग 4 से 5 डॉलर का प्रीमियम देना पड़ सकता है।
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भी तेज उछाल देखा गया है। हाल के दिनों में तेल की कीमतों में करीब 8.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि पूरे सप्ताह में कीमतें लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो ऊर्जा बाजार पर इसका असर और गहरा हो सकता है।











