छत्तीसगढ़: कोटवार का पद बाप-दादा की जागीर नहीं”: हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, अब वंश नहीं बल्कि योग्यता से होगी नियुक्ति

क्या था पूरा मामला? दरअसल, यह पूरा मामला एक नियुक्ति विवाद से जुड़ा है. एक याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए दावा किया था कि उसके पिता गांव के कोटवार थे, इसलिए नए कोटवार की नियुक्ति में उसे ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए. दूसरी ओर, स्थानीय प्रशासन ने नियमों का पालन करते हुए एक अन्य पात्र और योग्य व्यक्ति को गांव का कोटवार नियुक्त कर दिया था. प्रशासन के इसी फैसले को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.

कोर्ट की अहम टिप्पणियां: मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड और संबंधित नियमों का बारीकी से परीक्षण किया और प्रशासन द्वारा की गई नियुक्ति को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित बातें स्पष्ट कीं:
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स्वतः अधिकार नहीं: अगर कोई यह समझता है कि पिता या दादा के कोटवार होने से उसे यह पद स्वतः मिल जाएगा, तो यह धारणा पूरी तरह गलत है.
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प्रशासन का विवेकाधिकार: पूर्व कोटवार के परिवार को प्राथमिकता देना कोई अनिवार्य नियम नहीं है. यह केवल परिस्थितियों के आधार पर प्रशासन का विवेकाधिकार हो सकता है.
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रिश्तेदारी से नौकरी नहीं: किसी भी व्यक्ति को सिर्फ रिश्तेदारी या परिवार के नाम के आधार पर सरकारी या प्रशासनिक पद पर अधिकार नहीं मिल सकता.
काबिलियत और नियम होंगे सर्वोपरि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि कोटवार की नियुक्ति भू-राजस्व और प्रशासनिक नियमों के तहत होती है. इसके लिए उम्मीदवार की शैक्षिक योग्यता, आयु, उसका चरित्र और प्रशासनिक काम करने की क्षमता को परखा जाना अनिवार्य है. सरकारी पदों पर वंशवाद की कोई जगह नहीं है; नियम और काबिलियत ही सर्वोपरि होंगे.
फैसले का असर हाईकोर्ट के इस कड़े और स्पष्ट फैसले से गांवों में दशकों से चली आ रही उस भ्रांति और ‘वंश परंपरा’ पर पूरी तरह से रोक लग गई है, जिसमें कोटवार की कुर्सी को पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही परिवार की विरासत मान लिया जाता था. इस फैसले के बाद अब यह तय हो गया है कि गांव का कोटवार वही बनेगा, जो प्रशासन के नियमों की कसौटी पर खरा उतरेगा.











