छत्तीसगढ़ में हाथी संरक्षण योजनाओं पर उठे सवाल, छह साल में 70 हाथियों की मौत

छत्तीसगढ़ में हाथियों के संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इन दावों से अलग दिखाई दे रही है। पिछले छह वर्षों में प्रदेश में 70 हाथियों की मौत दर्ज की गई है। इनमें सबसे चिंताजनक स्थिति वर्ष 2025 में रही, जब अकेले 16 हाथियों की मौत हुई। इन मौतों में सात शावक हाथियों के नदी और तालाबों में डूबने की घटनाएं सामने आई हैं।
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार हाथियों की मौत के कई मामले खेतों की सुरक्षा के लिए लगाए गए करंट वाले तारों की चपेट में आने से जुड़े हैं। वर्ष 2020 में 3, 2021 में 4, 2022 में 9 और 2023 से जनवरी 2026 के बीच 14 हाथियों की मौत करंट लगने से हुई है। इसे मानव-हाथी संघर्ष का परिणाम माना जा रहा है।
वन विभाग ऐसे मामलों को रोकने के लिए ग्रामीणों को जागरूक करने और करंट वाले तार लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करता है। हालांकि दूसरी ओर तालाबों और नदियों में डूबने से हो रही मौतों को रोकने के लिए ठोस योजना का अभाव दिखाई देता है। वर्ष 2025 में ही सात शावक हाथियों की मौत तालाबों और दलदली जलाशयों में डूबने से हुई है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में हाथियों के डूबने की घटनाएं बार-बार हो रही हैं, वहां जलाशयों और दलदली क्षेत्रों की पहचान कर सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
प्रदेश में सबसे ज्यादा हाथियों की मौत रायगढ़ वन मंडल में दर्ज की गई है। यहां सात में से पांच शावक हाथियों की मौत तालाबों में डूबने या दलदल में फंसने से हुई है। क्षेत्र में हाथियों की लगातार आवाजाही के बावजूद जल स्रोतों के आसपास पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं होने से खतरा बना हुआ है।
प्रदेश में हाथियों की संख्या और उनके मूवमेंट को देखते हुए कई संरक्षण परियोजनाएं शुरू की गई हैं। इनका उद्देश्य हाथियों की निगरानी, कॉरिडोर संरक्षण और मानव-हाथी संघर्ष को कम करना है। इसके बावजूद लगातार हो रही मौतों ने इन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रदेश में लेमरू हाथी रिजर्व, प्रोजेक्ट एलीफेंट, हाथी ट्रैकिंग ऐप, हाथी मित्र दल और एआई आधारित निगरानी प्रणाली जैसे कई प्रोजेक्ट संचालित किए जा रहे हैं।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वाइल्ड लाइफ) अरुण कुमार पांडे के अनुसार तालाबों को कई स्थानों पर गहरे गड्ढों की तरह खोद दिया जाता है, जिससे हाथियों के बच्चों के डूबने की घटनाएं सामने आती हैं। उन्होंने बताया कि विभाग इन घटनाओं की निगरानी कर रहा है और लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है। साथ ही हाथियों की मौत के पीछे बीमारियां भी एक बड़ा कारण मानी जा रही हैं।











