महिलाओं के लिए कृषि में AI : अवसर, चुनौतियां और नई दिशा – डॉ. अखिलेश कुमार सिंह

भारत की कृषि व्यवस्था आज एक बड़े तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित तकनीकें खेती को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और लाभकारी बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। विशेष रूप से महिलाओं के लिए यह तकनीकी परिवर्तन एक बड़ा अवसर लेकर आया है, क्योंकि देश की कृषि व्यवस्था में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन संसाधनों और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी अभी भी सीमित है।
भारत में कृषि कार्यबल का लगभग 43 प्रतिशत हिस्सा महिलाएं हैं। वे खेती, पशुपालन, बीज संरक्षण, खाद्य प्रसंस्करण और वानिकी से जुड़े अनेक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी और भी अधिक है। इसके बावजूद महिलाओं के पास केवल 13–14 प्रतिशत कृषि भूमि का स्वामित्व है और संस्थागत ऋण, बाजार तथा आधुनिक तकनीक तक उनकी पहुँच अपेक्षाकृत कम है।
यदि हम छत्तीसगढ़ की बात करें तो यहाँ की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि और वन आधारित है। राज्य के लगभग 70 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवार कृषि और वन उपज पर निर्भर हैं। विभिन्न आकलनों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में कृषि कार्यों में महिलाओं की भागीदारी 60 प्रतिशत से अधिक है। विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में महिलाएँ खेती, वनोपज संग्रहण और पशुपालन में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।
राज्य में लगभग 32 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय से आती है। इन समुदायों की महिलाएँ महुआ, तेंदूपत्ता, इमली, हर्रा, बहेरा और लाख जैसी लघु वनोपज के संग्रहण और प्रसंस्करण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन गतिविधियों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है, लेकिन तकनीकी जानकारी और बाजार तक सीमित पहुँच के कारण महिलाओं को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता।
ऐसे समय में एआई आधारित कृषि तकनीकें महिलाओं के लिए नई संभावनाएँ खोल सकती हैं। सैटेलाइट आधारित फसल निगरानी, मशीन लर्निंग मॉडल और मोबाइल आधारित कृषि सलाह अब किसानों को वास्तविक समय में जानकारी देने लगे हैं। ये तकनीकें फसल रोग, कीट प्रकोप, मिट्टी की पोषक स्थिति और मौसम जोखिम की समय रहते पहचान कर सकती हैं। इससे किसान समय पर निर्णय लेकर नुकसान कम कर सकते हैं।
दुग्ध उत्पादन क्षेत्र में भी एआई तकनीक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। भारत का डेयरी उद्योग विश्व के सबसे बड़े उद्योगों में से एक है और इसमें महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। यदि पशुओं के स्वास्थ्य, दूध उत्पादन और पोषण प्रबंधन के लिए डिजिटल उपकरणों का उपयोग बढ़ता है तो ग्रामीण महिलाओं की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल कृषि के विकास में समावेशिता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान में कृषि से संबंधित जो डिजिटल डेटा उपलब्ध है, वह मुख्य रूप से गेहूँ और धान जैसी प्रमुख फसलों पर केंद्रित है। जबकि महिलाओं की भागीदारी बहुफसली खेती, बागवानी, दालें, मोटे अनाज और पशुपालन में अधिक होती है। यदि एआई मॉडल इन क्षेत्रों के डेटा को शामिल नहीं करेंगे, तो तकनीकी समाधान सीमित प्रभाव ही डाल पाएँगे।
इसीलिए आवश्यक है कि कृषि तकनीक के विकास में महिलाओं को भी केंद्र में रखा जाए। महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (SHGs), किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और ग्रामीण संस्थाओं को डिजिटल डेटा संग्रहण और तकनीक के प्रसार में शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना भी अत्यंत आवश्यक है।
भारत सरकार और विभिन्न राज्यों ने डिजिटल कृषि और जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें शुरू की हैं। इस दिशा में Government of India और Food and Agriculture Organization जैसी संस्थाएँ तकनीकी सहयोग और नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। कृषि क्षेत्र में बढ़ते जलवायु संकट को देखते हुए एआई आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और स्मार्ट सलाह सेवाएँ किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती हैं।
आज जब जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, बाढ़ और असामान्य मौसम की घटनाएँ बढ़ रही हैं, तब कृषि में नई तकनीकों का उपयोग अनिवार्य हो गया है। यदि इन तकनीकों को महिलाओं और आदिवासी किसानों तक पहुँचाया जाए, तो यह न केवल उनकी आय बढ़ाने में सहायक होगा बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बनाएगा।
अंततः, भारत की कृषि क्रांति तभी सफल मानी जाएगी जब उसमें महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व सुनिश्चित होगा। एआई आधारित कृषि तकनीकें महिलाओं को ज्ञान, सूचना और बाजार से जोड़ने का माध्यम बन सकती हैं। सही नीति, प्रशिक्षण और निवेश के माध्यम से यह तकनीकी परिवर्तन ग्रामीण भारत के लिए एक नई आर्थिक और सामाजिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।











