भोपाल: 21 साल से अटके मास्टर प्लान का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ दी हरी झंडी

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को भोपाल शहर का नया मसौदा मास्टर प्लान पेश करने की अनुमति दे दी लेकिन शर्त यह रखी कि इसे अदालत की अनुमति के बाद ही लागू किया जा सकेगा. कोर्ट ने साफ कहा कि रेसिडेंशियल इलाकों में चल रहे कमर्शियल प्रतिष्ठानों को बंद करने का बीएमसी (भोपाल म्युनिसिपल कॉरपोरेशन) का अभियान जारी रहेगा.
इससे उन व्यापारियों को झटका लगा है जो अपनी आजीविका की चिंता जताते हुए विरोध कर रहे थे. सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बताया कि बीएमसी के अभियान शुरू होने के दो दिन बाद गठित उच्च स्तरीय समिति को भंग कर दिया गया है.
‘भोपाल में 1995 से कोई मास्टर प्लान नहीं’
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया था कि वे अपनी राजधानियों के आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियां बंद करें. मध्य प्रदेश सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि भोपाल में 1995 से कोई मास्टर प्लान नहीं है, इसलिए नए मसौदा मास्टर प्लान की अनुमति मांगी गई.
‘अभियान रोकने का फैसला अवमानना जैसा’
सुनवाई की शुरुआत में एमिकस क्यूरी एके सिन्हा ने कहा कि अगस्त में सरकार द्वारा उच्च स्तरीय समिति बनाने और बीएमसी अभियान रोकने का फैसला अदालत की अवमानना जैसा है. इस पर राज्य सरकार के वकील नटराजन ने बताया कि समिति भंग कर दी गई है और अब बीएमसी के अभियान में कोई रुकावट नहीं है. एमिकस ने आगे कहा कि उन्हें निवासियों से कम से कम 10 शिकायतें मिली हैं.
23 अक्टूबर को मामले की अगली सुनवाई
इनमें आरोप है कि बीएमसी सुबह दुकानें बंद करती है, लेकिन शाम तक वे फिर खुल जाती हैं. साथ ही सुप्रीम कोर्ट का आदेश सब जगह बराबर लागू नहीं हो रहा है. इस पर कोर्ट ने साफ कहा कि उसके निर्देश का पूरा पालन हो और कोई भेदभाव न हो. बीएमसी को 23 अक्टूबर की अगली सुनवाई में कार्रवाई रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया.











