राज्यों के मनमाने खनन टैक्स पर केंद्र का बड़ा एक्शन, नया कानून लागू होने से वसूली पर लगेगी लगाम

खनिज क्षेत्र में टैक्स, अन्य लेवी को लेकर राज्यों के बीच असमानता खत्म करने और देश में एक समान और स्थिर वित्तीय व्यवस्था बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को राज्यसभा से पास करा लिया है. इस बिल में खनिज-युक्त भूमि को मौजूदा केंद्रीय नियंत्रण के दायरे में लाने का प्रावधान किया गया है.

नए संशोधनों का मुख्य उद्देश्य खनन क्षेत्र में निश्चितता, स्थिरता और पूर्वानुमेयता (Certainty, Stability and Predictability) सुनिश्चित करना है. सरकार का मानना है कि अलग-अलग राज्यों में खनिजों पर अलग-अलग दरों से टैक्स, सेस और अन्य लेवी लगाए जाने से खनन उद्योग पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है और परियोजनाओं की व्यावसायिक व्यवहार्यता प्रभावित होती है.

बिल में नया सेक्शन 9-डी जोड़ने का प्रावधान है. इसके तहत राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर किसी भी नाम से टैक्स, सेस या अन्य लेवी तभी लगा सकेंगी, जब वह केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों के अनुरूप हो.नए बिल के मुताबिक, इसके लागू होने से पहले यदि ऐसा कोई टैक्स, सेस या लेवी राज्य सरकार ने वसूल या प्राप्त नहीं किया है तो उसे प्रारंभ से ही अमान्य माना जाएगा.

नए बिल में क्या-क्या?

हालांकि, जो राशि पहले ही राज्य सरकार को जमा हो चुकी है या वसूल की जा चुकी है, उसकी वापसी की जिम्मेदारी नहीं होगी. इस नए बिल में Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 की धारा 13 में भी संशोधन का प्रस्ताव है. इसके जरिए केंद्र सरकार को यह तय करने के लिए नियम बनाने की शक्ति मिलेगी कि राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स, सेस अथवा अन्य लेवी किन शर्तों और सीमाओं के अधीन लगा सकती हैं.

सरकार के अनुसार, खनिज संसाधन सीमित हैं और देश के कुछ ही राज्यों में इनकी उपलब्धता अधिक है. ऐसे में राज्यों के बीच टैक्स और लेवी की दरों में भारी अंतर खनन क्षेत्र में असमान वित्तीय बोझ पैदा करता है. सरकार का तर्क है कि खनन शुरू होने के बाद नए करों की अप्रत्याशित घोषणा, उत्पादन या डिस्पैच पर अतिरिक्त लेवी और पिछली तारीख से टैक्स लगाने जैसी व्यवस्थाएं उद्योग में कानूनी एवं वित्तीय अनिश्चितता बढ़ाती हैं.

मध्यम स्तर के खनन संचालकों पर असर?

इसका असर विशेष रूप से छोटे और मध्यम स्तर के खनन संचालकों पर पड़ सकता है. अत्यधिक वित्तीय बोझ से खनन परियोजनाओं की व्यवहार्यता प्रभावित होने के साथ उत्पादन में कमी और कुछ मामलों में खदानों के बंद होने की स्थिति भी बन सकती है. सरकार के मुताबिक, खनिजों पर अतिरिक्त टैक्स और लेवी से उत्पादन तथा परिवहन लागत बढ़ सकती है. इसका असर आगे चलकर खनिज आधारित वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है और अंततः इसका बोझ आम उपभोक्ता पर भी आ सकता है.

बिल के स्टेटमेंट ऑफ ऑब्जेट्स एंड रीजन्स में पिछली तारीख से टैक्स लगाए जाने का एक प्रमुख समस्या के रूप में जिक्र है. सरकार का कहना है कि ऐसी व्यवस्था से कानूनी अनिश्चितता बढ़ती है, निवेशकों का भरोसा प्रभावित होता है और खनन परियोजनाओं के संचालन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. इसके अलावा, अलग-अलग राज्यों में लेवी की दरों में असमानता और उत्पादन अथवा डिस्पैच पर कई प्रकार की अतिरिक्त लेवी को भी दूर करने की जरूरत बताई गई है.

क्या है बिल का मकसद?

इस बिल का उद्देश्य खनिज क्षेत्र में ऐसा नियामकीय वातावरण तैयार करना है, जिसमें कंपनियों और खनन संचालकों को भविष्य की वित्तीय देनदारियों को लेकर अधिक स्पष्टता मिले और राज्यों के बीच लेवी की असमानता से पैदा होने वाली अनिश्चितता कम हो.गौरतलब है कि 2024 में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि राज्य को कर लेने का अधिकार है लेकिन आज इस विधेयक के पास होने बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले का फैसले का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा.

कुल मिलाकर, संशोधित विधेयक का फोकस खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर लगने वाले टैक्स, सेस और अन्य लेवी के लिए केंद्रीय स्तर पर स्पष्ट नियम एवं सीमाएं तय करना है. सरकार का दावा है कि इससे खनन क्षेत्र में वित्तीय स्थिरता बढ़ेगी, निवेश का माहौल बेहतर होगा और देश में खनिज संसाधनों के विकास को एक समान दिशा मिलेगी.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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