विकसित भारत 2047 की दिशा में आर्थिक परिवर्तन, सामाजिक समावेशन एवं पर्यावरणीय संतुलन पर हुई विस्तृत चर्चा

रायपुर।“विकसित भारत: सतत विकास – चुनौतियाँ एवं अवसर” विषय अर्थशास्त्र अध्ययन शाला, पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय दिवस में विकसित भारत 2047 की दिशा में आर्थिक परिवर्तन, सामाजिक समावेशन एवं पर्यावरणीय संतुलन पर विस्तृत चर्चा की गई।

राष्ट्रीय सेमिनार के समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. बंश गोपाल सिंह, पूर्व कुलपति, पंडित सुन्दर लाल शर्मा ओपन विश्वविद्यालय बिलासपुर ने विकसित भारत 2047 की परिकल्पना प्रस्तुत करते हुए गरीबी उन्मूलन, सर्वशिक्षा, कुशल मानव संसाधन, सामाजिक समानता एवं भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विकास अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए तथा जातीय भेदभाव का समापन आवश्यक है।

संगोष्ठी में आय असमानता, पर्यावरणीय क्षरण, कौशल असंतुलन, ग्रामीण अधोसंरचना की कमी तथा निजी अस्पतालों द्वारा अधिक शुल्क जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन एवं ग्रीन हाइड्रोजन को रोजगार के नए अवसरों के रूप में रेखांकित किया गया।

विशिष्ट अतिथि आलोक देव ने डिजिटल इंडिया, वित्तीय समावेशन, महिला सशक्तिकरण एवं स्व-सहायता समूहों की सराहना की। डॉ. बी. आर. अंबेडकर के आर्थिक दृष्टिकोण तथा भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए कहा गया कि राजनीतिक लोकतंत्र आर्थिक समानता के बिना संभव नहीं है।

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर से विषय विशेषज्ञ प्रो. कन्हैया आहूजा ने वर्तमान केंद्रीय बजट के प्रमुख आयामों पर प्रकाश डालते हुए *केयर इकॉनमी* के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कोविड-19 के बाद सरकार की नीतिगत परिवर्तनों की चर्चा की तथा कहा कि “धान का कटोरा” कहलाने वाला छत्तीसगढ़ अब केवल धान उत्पादन तक सीमित न रहकर औद्योगिक विविधीकरण और मूल्य संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

प्रो. प्रीति कंसारा ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), तकनीकी परिवर्तन, एमएसएमई क्षेत्र को सशक्त बनाने तथा महिलाओं की कम श्रम भागीदारी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के माध्यम से महिला, युवा एवं किसानों के सामूहिक प्रयासों तथा कौशल विकास पर बल दिया।

अंत में यह निष्कर्ष निकाला गया कि विकसित भारत 2047 के लिए केवल जीडीपी वृद्धि नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और समावेशी विकास अनिवार्य है।
इस कार्यक्रम में प्रो. रवीन्द्र ब्रम्हे, प्रो. बी. एल. सोनेकर, प्रो. के. सी. जैन, प्रो. एन. पी. पाठक, प्रो. पी. के. घोष, प्रो. एस. एन. चतुर्वेदी आदि ने संबोधित किया। सेमीनार की समन्वयक डाॅ. अर्चना सेठी ने सेमीनार का संक्षिप्त प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। धन्यवाद ज्ञापन आयोजन सचिव डाॅ. सुनील कुमेटी तथा संचालन डाॅ. प्रगति कृष्णन ने किया। इस सेमीनार में देश के विभिन्न राज्यों से आये अर्थशास्त्री, शिक्षाविद, नीति निर्माताओं ने अपना विचार व्यक्त किया तथा शोधार्थियों ने अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम में अर्थशास्त्र अध्ययन शाला के अतिरिक्त विश्वविद्यालय के प्राध्यापकगण और विद्यार्थी उपस्थित थे।

close