धमतरी का ‘नो फायर’ विलेज! यहाँ होली पर नहीं जलती होलिका और न ही होता है रावण दहन

धमतरी : विज्ञान और तकनीक की चकाचौंध से परे, छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का एक छोटा सा गाँव ‘तेलिनसत्ती’ आज भी अपनी विशिष्ट पहचान को संजोए हुए है. आधुनिकता के इस दौर में जहाँ पुरानी मान्यताएं अक्सर धूमिल होती जा रही हैं, यह गाँव अपनी सदियों पुरानी संस्कृति का अडिग स्तंभ बना हुआ है. यहाँ होली का उत्सव तो हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, किंतु ‘होलिका दहन’ की अग्नि यहाँ कभी नहीं प्रज्वलित होती.
इतिहास की एक हृदय विदारक गाथा
इस परंपरा का उद्गम 12वीं शताब्दी की एक मार्मिक घटना से जुड़ा है. लोकश्रुतियों के अनुसार, गाँव के एक जमींदार परिवार में सात भाइयों की एक बहन थी, जिसका पति वहीं निवास करता था. एक बार खेत की मेड़ के विवाद में भाइयों द्वारा बहनोई की नृशंस हत्या कर दी गई. इस अपूरणीय क्षति और वियोग से व्यथित होकर, उस सती नारी ने पति की चिता पर स्वयं को समर्पित कर दिया. उसी क्षण से यह गाँव शोक और संयम के बंधन में बंध गया, जहाँ अग्नि का उपयोग अनुष्ठानों में पूर्णतः वर्जित कर दिया गया.

अटूट है परंपरा का अनुशासन
इस गाँव की रवायत का अनुशासन अत्यंत कठोर है. यहाँ न केवल होलिका दहन का निषेध है, अपितु विजयादशमी के पावन अवसर पर रावण का पुतला दहन करना भी प्रतिबंधित है. विडंबना यह है कि गाँव की सीमा के भीतर अंतिम संस्कार भी वर्जित है, जिसके लिए शोक संतप्त परिजनों को गाँव की परिधि से बाहर जाना पड़ता है. ग्रामीणों की यह दृढ़ मान्यता है कि गाँव की सीमा में अग्नि का प्रज्वलन किसी बड़ी अनिष्टकारी विपदा को निमंत्रित करना है.
आस्था और दैवीय सुरक्षा का संगम
‘तेलिन सती माता’ के प्रति ग्रामीणों की अटूट श्रद्धा और विश्वास ही उनकी सुरक्षा कवच है. निवासियों का मानना है कि माता का आशीर्वाद ही वह दैवीय शक्ति है, जिसके प्रभाव से यह गाँव हैजा जैसी भयावह महामारियों के प्रकोप से सुरक्षित रहा है, जबकि आसपास के क्षेत्र इसके प्रभाव से अछूते नहीं रहे.
यह गाँव इस तथ्य का जीवंत साक्ष्य है कि आधुनिकता और परंपरा का सह-अस्तित्व संभव है. टेलिनसत्ती की यह संस्कृति न केवल आस्था का परिचायक है, बल्कि सामुदायिक एकता का एक अद्भुत उदाहरण भी प्रस्तुत करती है. विज्ञान के इस युग में भी, यहाँ के लोग अपनी जड़ों से जुड़े रहकर अपनी संस्कृति पर गौरव का अनुभव करते हैं.











