छत्तीसगढ़ की राजनीति में हलचल: राज्यसभा के लिए साहू समाज ने ठोकी ताल, स्वाभिमान की लड़ाई तेज

धमतरी/रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजनीति में ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने वाले साहू समाज ने आगामी राज्यसभा चुनावों के लिए अपनी दावेदारी पूरी मजबूती के साथ पेश कर दी है. प्रदेश की सबसे बड़ी आबादी और जागरूक वर्ग के रूप में पहचान रखने वाले इस समाज ने अब स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें केवल वोट बैंक के रूप में न देखा जाए, बल्कि देश की सबसे बड़ी पंचायत (राज्यसभा) में उन्हें उनका जायज हक और प्रतिनिधित्व दिया जाए.
प्रमुख नेतृत्व से मुलाकात और चर्चा
छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ के प्रदेश अध्यक्ष निरेन्द्र साहू के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने राजधानी रायपुर में सक्रियता दिखाते हुए प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की. प्रतिनिधिमंडल ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंह देव और नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत से प्रत्यक्ष भेंट कर समाज की भावनाओं और अपेक्षाओं से अवगत कराया. साथ ही, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज से दूरभाष पर विस्तार से चर्चा कर समाज का पक्ष रखा.

संख्या बल के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग
मुलाकात के दौरान प्रदेश अध्यक्ष निरेन्द्र साहू ने दोटूक शब्दों में कहा कि छत्तीसगढ़ के विकास की धुरी रहने वाला साहू समाज प्रदेश में बहुसंख्यक और सामाजिक रूप से सबसे अग्रणी है. उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि इतनी बड़ी आबादी और सक्रियता के बावजूद आज तक राज्यसभा में समाज के किसी भी व्यक्ति को अवसर नहीं मिलना एक बड़ा प्रश्नचिह्न है. समाज अब चाहता है कि उसकी आवाज दिल्ली के गलियारों में भी गूंजे.
2018 के घटनाक्रम का हवाला
समाज ने याद दिलाया कि वर्ष 2018 के राज्यसभा चुनाव में कुरुद के पूर्व विधायक लेखराम साहू को कांग्रेस द्वारा टिकट दिया गया था, जबकि उस समय पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत का अभाव था. अब जबकि वर्ष 2026 की देहली पर समीकरण और संख्या बल अनुकूल हैं, समाज अपनी राजनीतिक सहभागिता को लेकर अधिक मुखर है. समाज का मानना है कि जो दल इस बार उनकी भावनाओं का सम्मान करेगा, समाज भी उस दल के प्रति अपनी पूरी निष्ठा और सहयोग समर्पित करेगा.
स्वाभिमान और पहचान का सवाल
प्रदेश संयुक्त सचिव प्रदीप साहू ने एक भावुक बयान जारी करते हुए कहा कि यह केवल एक पद की मांग नहीं, बल्कि लाखों साहू बंधुओं के स्वाभिमान और उनकी पहचान का सवाल है. उन्होंने कहा, “वर्षों से हम अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन हर बार हमें पीछे छोड़ दिया जाता है. क्या प्रदेश के निर्माण में खून-पसीना बहाने वाले साहू समाज का हक राज्यसभा पर नहीं है?” उन्होंने नेतृत्व से आग्रह किया कि समाज के भीतर पनप रही इस भावनात्मक पीड़ा और कसक को समझा जाए और न्याय प्रदान किया जाए.
साहू समाज की यह एकजुटता और मुखरता छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक नए अध्याय का संकेत है. समाज का यह कदम न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विषय है, बल्कि यह सामाजिक सम्मान और समान भागीदारी की दिशा में एक बड़ा आंदोलन बनता दिख रहा है. अब गेंद राजनीतिक दलों के पाले में है कि वे इस विशाल और जागरूक वर्ग की उम्मीदों को कितना महत्व देते हैं.











