सुप्रीम कोर्ट ने ईशा फाउंडेशन के गैसीफायर श्मशान घाट की सराहना की, जमीन विवाद सुलझाने को मध्यस्थ नियुक्त

सुप्रीम कोर्ट ने कोयंबटूर स्थित ईशा योग सेंटर में संचालित गैसीफायर श्मशान घाट की प्रशंसा करते हुए इसे ‘पवित्र कार्य’ बताया है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि मृतकों को सम्मानजनक अंतिम विदाई देना सराहनीय पहल है।

यह मामला श्मशान घाट से जुड़े जमीन विवाद को लेकर दायर याचिका से संबंधित है। मद्रास हाई कोर्ट पहले ही इस याचिका को खारिज कर चुका था। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता पूर्व में अपनी कुछ जमीन ईशा फाउंडेशन को बेच चुका है। ऐसे में अदालत ने सुझाव दिया कि लंबी कानूनी लड़ाई के बजाय दोनों पक्ष आपसी सहमति और बातचीत से समाधान निकालें।

दोनों पक्षों की सहमति के बाद अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस राजेंद्रन को मध्यस्थ नियुक्त किया है। उनकी देखरेख में जमीन विवाद को सुलझाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

अदालत में यह भी बताया गया कि ईशा फाउंडेशन वर्ष 2010 से तमिलनाडु के विभिन्न शहरों, जैसे चेन्नई, कोयंबटूर, वेल्लोर और तंजावुर में लगभग 30 श्मशान घाटों की देखरेख कर रहा है। इन स्थानों को पारंपरिक श्मशान घाटों के बजाय स्वच्छ, हरित और शांत वातावरण वाले परिसर के रूप में विकसित किया गया है।

इन गैसीफायर श्मशान घाटों में लकड़ी के स्थान पर एलपीजी का उपयोग किया जाता है, जिससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। परिसर में स्वच्छ स्नानघर, शौचालय और बैठने की समुचित व्यवस्था भी उपलब्ध कराई गई है।

इसके अलावा, ईशा फाउंडेशन ने तमिलनाडु सरकार के सहयोग से गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को मुफ्त अंतिम संस्कार सेवाएं उपलब्ध कराने की योजना भी शुरू की है। अदालत ने उम्मीद जताई कि दोनों पक्ष मध्यस्थता के माध्यम से विवाद का स्थायी समाधान निकालेंगे।

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