सहारनपुर के बरसी गांव में अनोखी परंपरा, महाभारत काल से नहीं होता होलिका दहन

सहारनपुर: जिला मुख्यालय से करीब 42 किलोमीटर दूर स्थित बरसी गांव अपनी अनोखी धार्मिक परंपरा के लिए जाना जाता है. यहां होली का पर्व तो पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है, लेकिन होली की पूर्व संध्या पर होने वाला होलिका दहन गांव में नहीं किया जाता. ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा महाभारत काल से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है. ग्रामीणों की मान्यता है कि बरसी गांव के पश्चिमी छोर पर स्थित महाभारत कालीन सिद्धपीठ शिव मंदिर बरसी में भगवान शिव का वास है.

यहां प्राचीन काल से स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है. लोगों का विश्वास है कि होलिका दहन की आग से भोलेनाथ के चरण जलते हैं, इसी कारण गांव में कभी होलिका नहीं जलाई जाती. रीति-रिवाज के अनुसार, बरसी गांव की विवाहित महिलाएं और युवतियां पड़ोसी गांवों में जाकर होली पूजन और होलिका दहन में शामिल होती हैं. गांव के लोग पास के टिकरोल गांव में जाकर होलिका दहन करते हैं और फिर अपने गांव लौटकर होली खेलते हैं.

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि इस शिव मंदिर का निर्माण कौरवों द्वारा कराया गया था. कथा के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध के लिए जाते समय भीम ने मंदिर के मुख्य द्वार पर अपनी गदा से प्रहार किया था, जिससे मंदिर का मुख पूर्व से पश्चिम की ओर हो गया. इसी वजह से इसे देश का एकमात्र पश्चिममुखी शिव मंदिर माना जाता है.

मान्यता यह भी है कि कृष्ण कुरुक्षेत्र जाते समय इस गांव में रुके थे और उन्होंने इसे बृज कहा था, तभी से गांव का नाम बरसी पड़ गया. स्थानीय निवासी रवि ने बताया कि वे पास के खड़लाना गांव से नियमित रूप से यहां पूजा करने आते हैं. उनके अनुसार “यह सच्चाई है कि बरसी गांव में होलिका दहन नहीं होता. यहां की आस्था और परंपरा सदियों से वैसी ही चली आ रही है.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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