FCRA क्या है? विदेश से पैसा लेने पर सरकार के क्या नियम हैं?

देश की संसद में इन दिनों दो बड़े बिलों को लेकर सियासी हलचल चल रही है. पहला परिसीमन (डिलिमिटेशन) बिल और दूसरा विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी FCRA Amendment Bill, 2026. दिलचस्प बात यह है कि भाजपा को परिसीमन बिल के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने के वास्ते DMK, शरद पवार गुट की NCP(SP) और कई क्षेत्रीय दलों की जरूरत है, लेकिन यही दल FCRA संशोधन बिल के खुले विरोध में हैं, जिससे सरकार असमंजस में है. मानसून सत्र में गृह मंत्री अमित शाह इस बिल पर बोल सकते हैं.

इसी बीच अमेरिकी कांग्रेसमैन राइली मूर के एक बयान कि यह बिल चर्चों और ईसाई संस्थाओं पर “कब्जे” की तैयारी है, इसने विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा दिया. भारत सरकार ने इस दावे को भ्रामक बताते हुए खारिज कर दिया. गृह मंत्रालय ने हाल ही में एक विस्तृत FAQ जारी कर बिल को “पारदर्शिता बढ़ाने वाला” कदम बताया, जबकि विपक्ष और सिविल सोसाइटी संगठनों का कहना है कि इससे हजारों NGO के कामकाज पर खतरा मंडरा सकता है. आइए समझते हैं कि FCRA क्या है और नया संशोधन क्या बदलने वाला है.

सवाल- FCRA क्या है?

जवाब- FCRA यानी Foreign Contribution (Regulation) Act एक केंद्रीय कानून है, जो तय करता है कि भारत में कौन-सा व्यक्ति, संस्था, ट्रस्ट या NGO विदेश से पैसा, सामान या फंड ले सकता है. इसे गृह मंत्रालय लागू करता है. यह कानून तीन काम करता है. पहला कौन विदेशी चंदा ले सकता है, यह तय करना. दूसरा वह पैसा कैसे लिया जाए, कैसे खर्च किया जाए और उसका हिसाब कैसे दिया जाए और तीसरा ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाना, जिनसे देश की सुरक्षा, एकता या कानून-व्यवस्था पर असर पड़ सकता हो.

सवाल- एक्ट का मकसद और 2026 का संशोधन बिल क्यों लाया गया?

जवाब- इस कानून का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी पैसे के जरिए देश की राजनीति, समाज या सुरक्षा पर गलत असर न पड़े. साथ ही विदेशी चंदा लेने वाली संस्थाएं अपना पूरा हिसाब-किताब साफ तरीके से रखें. मार्च 2026 में सरकार ने लोकसभा में नया संशोधन बिल पेश किया. इसकी बड़ी वजह यह बताई गई कि पिछले एक दशक में करीब 22 हजार NGO का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द हो चुका है और करीब 15 हजार का रिन्यूअल नहीं हो पाया. इससे इन संस्थाओं की विदेशी फंड से बनी संपत्तियां और बैंक में पड़ा पैसा कानूनी उलझन में फंस गया. नया बिल एक “नामित प्राधिकरण” बनाने का प्रस्ताव करता है, जो ऐसी रद्द, सरेंडर या खत्म हो चुकी संस्थाओं की विदेशी फंड से जुड़ी संपत्तियों का प्रबंधन करेगा. सरकार का कहना है कि यह सिर्फ व्यवस्था साफ करने के लिए है, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे सरकार को जरूरत से ज्यादा अधिकार मिल जाएंगे.

सवाल- 1976 से अब तक क्या-क्या हुआ? पूरी टाइमलाइन क्या है?

जवाब-

  • 1976: आपातकाल के दौरान FCRA कानून बना, ताकि सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संगठनों पर विदेशी प्रभाव की निगरानी हो सके.
  • 1984: विदेशी चंदा लेने से पहले सभी NGO के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी किया गया.
  • 2010: पुराना कानून हटाकर नया और ज्यादा सख्त FCRA Act लागू हुआ. प्रशासनिक खर्च की सीमा 50% तय हुई.
  • 2016, 2018: नियमों में बदलाव कर निगरानी और मजबूत की गई.
  • 2020- बड़ा संशोधन हुआ. पदाधिकारियों के लिए आधार-पासपोर्ट जरूरी. पूरा विदेशी चंदा दिल्ली की तय SBI शाखा के खाते में ही आएगा. NGO से NGO को फंड देने पर रोक. प्रशासनिक खर्च की सीमा 50% से घटाकर 20% कर दी गई.
  • 2022: रिश्तेदारों से मिलने वाली विदेशी रकम की सालाना सीमा बढ़ाकर 10 लाख रुपये की गई.
  • मार्च 2026: FCRA संशोधन बिल लोकसभा में पेश हुआ, बाद में इस पर चर्चा टाल दी गई.
  • जून-जुलाई 2026: नए FCRA नियम लागू किए गए और मानसून सत्र में बिल फिर पेश किया गया.

सवाल- FCRA कैसे काम करता है?

जवाब- कोई भी संस्था विदेशी चंदा तभी ले सकती है, जब उसके पास FCRA रजिस्ट्रेशन हो (कम-से-कम तीन साल से काम कर रही संस्था को मिलता है) या प्रायर परमिशन (एक बार की अनुमति) हो. इसके अलावा-

  • रजिस्ट्रेशन पांच साल के लिए मान्य होता है और समय पर रिन्यू कराना जरूरी है.
  • पूरा विदेशी चंदा सिर्फ नई दिल्ली की तय SBI शाखा के FCRA खाते में ही आ सकता है.
  • पैसा सिर्फ उसी काम पर खर्च किया जा सकता है, जिसके लिए संस्था बनी है.
  • प्रशासनिक खर्च विदेशी चंदे का 20% से ज्यादा नहीं हो सकता.
  • हर साल FC-4 फॉर्म में ऑडिटेड रिपोर्ट MHA के ऑनलाइन पोर्टल पर जमा करनी होती है.
  • राजनीतिक दल, सरकारी कर्मचारी और मीडिया संस्थान विदेशी चंदा नहीं ले सकते. 2020 में लोकसेवकों को भी इस सूची में जोड़ दिया गया.

सवाल- विदेशी पैसा किन-किन सेक्टरों में इस्तेमाल होता है?

जवाब- गृह मंत्रालय के मुताबिक विदेशी चंदे का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, सामाजिक कल्याण, पर्यावरण संरक्षण, संस्कृति और विरासत, आपदा राहत तथा धार्मिक और आस्था से जुड़े कल्याणकारी कार्यों में किया जाता है. इससे स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, क्लीनिक, मोबाइल हेल्थ यूनिट, स्वच्छ पानी और आजीविका परियोजनाएं चलाई जाती हैं. साथ ही दिव्यांगों, बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए योजनाएं, पेड़ लगाने और स्वच्छ ऊर्जा जैसे पर्यावरणीय कार्यक्रम, सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण, आपदा राहत और पूजा स्थलों के रखरखाव व धार्मिक शिक्षा जैसे कार्य भी विदेशी फंड से संचालित किए जाते हैं. वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 16,200 पंजीकृत संस्थाओं को कुल मिलाकर लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा मिला.

सवाल- 2026 के संशोधन में नया क्या है?

जवाब-

  1. नई Designated Authority बनाई जाएगी, जो रद्द, सरेंडर या खत्म हो चुके FCRA रजिस्ट्रेशन वाली संस्थाओं की विदेशी फंड से जुड़ी संपत्ति और बैंक बैलेंस अपने नियंत्रण में ले सकेगी.
  2. अगर संस्था का रजिस्ट्रेशन वापस नहीं मिलता, तो ऐसी संपत्ति सरकारी विभागों को ट्रांसफर की जा सकती है या बेची जा सकती है. रिन्यूअल के लिए नई शर्त पिछले दो वित्त वर्षों में कम-से-कम 10 लाख रुपये का विदेशी चंदा खर्च दिखाना होगा, वरना लाइसेंस रद्द होने का खतरा रहेगा.
  3. धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों के लिए विदेशी चंदे के इस्तेमाल पर साफ रोक जोड़ी गई है, जबकि पूजा स्थल के रखरखाव और धार्मिक शिक्षा जैसे वैध धार्मिक कामों की अनुमति रहेगी.
  4. नियमों की जिम्मेदारियां और साफ की गई हैं और उल्लंघन पर कड़ी सजा का प्रावधान है.

सवाल- NGO पर इसका क्या असर होगा?

जवाब- समर्थकों का कहना है कि इससे उन हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियों का बेहतर प्रबंधन हो सकेगा, जो लाइसेंस रद्द होने के बाद कानूनी उलझन में फंसी हुई थीं. वहीं, आलोचकों और सिविल सोसाइटी संगठनों का कहना है कि इससे उन संस्थाओं की आजादी प्रभावित हो सकती है, जिन्होंने विदेशी और घरेलू दोनों स्रोतों से पैसा जुटाकर स्कूल, अस्पताल और दूसरी लंबी अवधि की परियोजनाएं बनाई हैं. छोटे बजट वाले NGO के लिए रिन्यूअल की नई शर्त पूरी करना मुश्किल हो सकता है, जिससे उनका लाइसेंस रद्द होने का खतरा बढ़ सकता है.

सवाल- विरोध क्यों हो रहा है?

जवाब- FCRA संशोधन बिल का कई विपक्षी दलों और सिविल सोसाइटी संगठनों ने विरोध किया है. कांग्रेस, DMK, वामपंथी दल, YSRCP और NCP-SP समेत कई दलों का आरोप है कि इससे NGO के कामकाज पर असर पड़ेगा और सरकार को जरूरत से ज्यादा अधिकार मिल जाएंगे. कुछ नेताओं का यह भी कहना है कि पुराने NGO पर सख्ती की जा रही है, जबकि कुछ चुनिंदा संगठनों को राहत दी जा रही है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी सांसद राइली मूर ने दावा किया कि यह बिल चर्च और ईसाई संस्थाओं पर “कब्जे” की तैयारी है. हालांकि, भारत सरकार और कई भारतीय मीडिया संस्थानों ने इस दावे को तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक बताया है. वहीं, FATF की 2024 समीक्षा में कहा गया था कि सख्त निगरानी केवल उन संस्थाओं पर होनी चाहिए जिन पर आतंकी फंडिंग का जोखिम हो, जबकि आलोचकों का कहना है कि नया बिल पूरे NGO सेक्टर पर व्यापक सख्ती लागू करता है. इसके अलावा संसद में भी राजनीतिक पेच बना हुआ है, क्योंकि परिसीमन बिल के लिए जिन क्षेत्रीय दलों के समर्थन की जरूरत है. वही, FCRA संशोधन बिल का विरोध कर रहे हैं.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
close
Virus-free.www.avast.com