सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सजा माफी के मामलों में राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियां सर्वोपरि

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत सजा में राहत या माफी देने की राज्यपाल की शक्ति को किसी कानूनी नीति या प्रशासनिक प्रावधान के जरिए सीमित या निरस्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यह शक्ति स्वतंत्र और संवैधानिक है, जिस पर बाद में बनाई गई किसी नीति का प्रभाव नहीं पड़ेगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि वर्ष 2002 की सजा माफी नीति, जिसे अनुच्छेद 161 के तहत लागू किया गया था, बाद में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत बनाई गई 2008 की नीति से समाप्त नहीं मानी जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की शक्तियां किसी अन्य वैधानिक व्यवस्था से नियंत्रित नहीं होती हैं।

यह फैसला एक उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी की याचिका पर आया, जिसने समयपूर्व रिहाई की मांग की थी। अदालत ने पाया कि उसके मामले पर विचार राज्यपाल के समक्ष किया जाना चाहिए था, जबकि सरकार ने CrPC के प्रावधानों के तहत प्रक्रिया अपनाई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल को संविधान के तहत प्राप्त दया याचिका और सजा माफी संबंधी अधिकार स्वतंत्र हैं। ऐसे मामलों में राज्य सरकार की रिमिशन नीति राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों को प्रभावित नहीं कर सकती।

राज्यपाल के पास सरकार गठन, विधानसभा सत्र बुलाने या स्थगित करने, विधेयकों को मंजूरी देने या राष्ट्रपति के पास सुरक्षित रखने, अध्यादेश जारी करने, मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की नियुक्ति, राष्ट्रपति शासन की सिफारिश तथा विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में महत्वपूर्ण संवैधानिक जिम्मेदारियां भी होती हैं।

अदालत के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि राज्यपाल को संविधान के तहत प्राप्त विशेष अधिकारों को किसी सामान्य कानूनी नीति के माध्यम से सीमित नहीं किया जा सकता। माना जा रहा है कि यह निर्णय भविष्य में सजा माफी और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित होगा।

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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