लद्दाख के लिए तैयार हो रहा वो मॉडल जो पूरे देश में कहीं नहीं… आखिर इसमें क्या है?

लद्दाख के लिए केंद्र सरकार एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था तैयार करने पर काम कर रही है, जो देश के किसी दूसरे राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में बिल्कुल इसी रूप में मौजूद नहीं है. इसे आर्टिकल 371 के तहत नया प्रावधान यानी आर्टिकल 371(K) कहा जा रहा है. इसका मकसद लद्दाख के लोगों को उनकी जमीन, रोजगार, संस्कृति, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े मामलों में ज्यादा संवैधानिक सुरक्षा देना है.

हालांकि, अभी यह कानून नहीं बना है, बल्कि केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच इस पर बातचीत चल रही है. लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने बताया है कि प्रस्तावित व्यवस्था में पूरे लद्दाख के लिए एक सीधे चुना हुआ UT-स्तरीय निकाय बनाया जा सकता है. यानी लोग सीधे अपने प्रतिनिधि चुनेंगे और यह निकाय कुछ स्थानीय मुद्दों पर फैसले और कानून बनाने की ताकत रख सकता है. अक्टूबर के पहले सप्ताह में अगली बैठक प्रस्तावित है, जिसमें इस मॉडल के ड्राफ्ट पर आगे चर्चा होनी है.

संवैधानिक सुरक्षा की जरूरत क्यों पड़ी?

लद्दाख को 31 अक्टूबर 2019 को जम्मू-कश्मीर से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था. लेकिन जम्मू-कश्मीर के विपरीत लद्दाख को विधानसभा नहीं मिली. इसके बाद वहां प्रशासन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से उपराज्यपाल और अधिकारियों के जरिए चलती रही. लद्दाख में पहले विधानसभा के चार विधायक होते थे, लेकिन 2019 के बाद यह व्यवस्था खत्म हो गई. इसके बाद स्थानीय स्तर पर जमीन, रोजगार, जनसांख्यिकी और सांस्कृतिक पहचान को लेकर चिंताएं सामने आती रहीं.

क्या हैं लद्दाख के लोगों की प्रमुख मांग?

लद्दाख के प्रतिनिधि लंबे समय से ज्यादा राजनीतिक अधिकार और संवैधानिक सुरक्षा की मांग करते रहे हैं. उनकी प्रमुख मांगों में राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल करना, जमीन और रोजगार की सुरक्षा और ज्यादा राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसी बातें रही हैं. अभी लेह और कारगिल की अलग-अलग LAHDC यानी स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदें हैं. लेकिन ये छठी अनुसूची के तहत नहीं आतीं और उनकी शक्तियां सीमित हैं.

क्यों पड़ी आर्टिकल 371(k) की जरुरत?

आर्टिकल 371(K) का प्रस्ताव आया

इसके बाद लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल कर यहां के जनजातीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करने की मांग तेज हो गई. अब केंद्र की तरफ से आर्टिकल 371(K) का प्रस्ताव सामने आया है. इसका मतलब ये नहीं है कि लद्दाख को राज्य का दर्जा मिल रहा है. बल्कि कोशिश एक अलग और खास प्रशासनिक मॉडल बनाने की है. आशीष कुंद्रा ने भी कहा है कि लद्दाख के लिए ऐसा मॉडल तैयार किया जा रहा है, जो देश में कहीं और मौजूद नहीं है.

पहले जानते हैं कि आर्टिकल 371 क्या है?

  • संविधान में आर्टिकल 371 से लेकर 371J तक अलग-अलग विशेष प्रावधान हैं.
  • इनका इस्तेमाल अलग-अलग राज्यों की खास जरूरतों और परिस्थितियों के लिए किया गया है.
  • आर्टिकल 371A नागालैंड की जमीन, परंपराओं और स्थानीय कानूनों से जुड़ी सुरक्षा देता है.
  • आर्टिकल 371G मिजोरम की सामाजिक-धार्मिक परंपराओं और जमीन से जुड़े मामलों में सुरक्षा देता है.
  • आर्टिकल 371J कर्नाटक के कल्याण-कर्नाटक क्षेत्र के विकास और शिक्षा-रोजगार से जुड़े अवसरों के लिए विशेष व्यवस्था करता है.
  • अब लद्दाख के लिए इसी तरह का नया प्रावधान आर्टिकल 371K लाने की बात हो रही है.

लद्दाख में आर्टिकल 371(K) से क्या बदल सकता है?

सबसे जरूरी बात है कि लद्दाख में एक UT-स्तरीय निर्वाचित निकाय बनाया जा सकता है. अभी लद्दाख में लेह और कारगिल की अलग-अलग लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदें यानी LAHDCs हैं. प्रस्तावित व्यवस्था में इनके ऊपर पूरे लद्दाख के स्तर पर एक नया निकाय हो सकता है.

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इस निकाय के सदस्य सीधे चुनाव के जरिए चुने जाने की बात सामने आई है. यानी लद्दाख के लोग सीधे अपने प्रतिनिधियों को चुनेंगे. लद्दाख प्रशासन के मुताबिक इस बात पर चर्चा में सहमति बनी है कि UT-स्तरीय निकाय के प्रतिनिधि सीधे निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाएं.

इस नए निकाय को किन मुद्दों पर ताकत मिल सकती है?

प्रस्ताव के मुताबिक इसकी ताकत सिर्फ सलाह देने तक सीमित नहीं होगी. इसे कुछ स्थानीय विषयों पर कानून बनाने और प्रशासनिक फैसले लेने की शक्ति देने की बात है.
मुख्य मुद्दे ये हैं:

  • जमीन
  • रोजगार
  • संस्कृति और भाषा
  • जंगल
  • पर्यावरण
  • प्राकृतिक संसाधन
  • स्थानीय विकास और योजना

यानी अगर यह मॉडल अपने प्रस्तावित रूप में लागू होता है तो लद्दाख के स्थानीय प्रतिनिधियों की इन मुद्दों पर भूमिका बढ़ सकती है. हालांकि किस विषय पर कितनी शक्ति होगी, यह अभी पूरी तरह तय नहीं है.

आर्टिकल 371(k) की ताकत क्या होगी?

छठी अनुसूची से अलग कैसे है यह मॉडल?

लद्दाख को लेकर पहले छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग भी उठती रही है. छठी अनुसूची संविधान के आर्टिकल 244 के तहत असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में लागू है. इसके तहत स्वायत्त जिला परिषद को जमीन, जंगल, पानी, खेती, स्थानीय संस्थाओं और कुछ सामाजिक मामलों में कानून और प्रशासन से जुड़ी शक्तियां मिलती हैं. लेकिन आर्टिकल 371(K) का प्रस्ताव इससे अलग दिखाई देता है.

छठी अनुसूची में जिला स्तर की स्वायत्त संस्थाएं होती हैं, जबकि प्रस्तावित 371(K) के तहत पूरे UT के स्तर पर सीधे चुना हुआ निकाय बनाने की बात है. यानी लद्दाख के लिए किसी मौजूदा व्यवस्था को सीधे लागू करने के बजाय एक अलग मॉडल तैयार किया जा रहा है. हालांकि, अंतिम अंतर तभी साफ होगा, जब आर्टिकल 371(K) का पूरा ड्राफ्ट सामने आएगा.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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