छत्तीसगढ़: 10 करोड़ का धान घोटाला! आदेश के बाद भी FIR नहीं, सिस्टम पर बड़ा सवाल, 32 हजार क्विंटल धान गायब…

सूरजपुर: जिले की धान खरीदी व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है. उपार्जन केंद्र सावारांवा में सामने आए भारी अंतर ने न सिर्फ प्रशासनिक निगरानी की पोल खोल दी है, बल्कि करोड़ों के संभावित घोटाले की आशंका को भी जन्म दे दिया है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कलेक्टर द्वारा एफआईआर दर्ज कराने के स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बाद भी अब तक कार्रवाई ठप पड़ी है.
जानकारी के अनुसार, 10 फरवरी 2026 को कलेक्टर खाद्य शाखा ने शाखा प्रबंधक, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक ओड़गी को खरीदी प्रभारी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए थे. इसके बावजूद अब तक एफआईआर दर्ज होने की पुष्टि नहीं हो पाई है, जिससे प्रशासनिक उदासीनता या दबाव की आशंका जताई जा रही है.
पूरे मामले का खुलासा 1 फरवरी 2026 को हुए भौतिक सत्यापन में हुआ, जब एसडीएम भैयाथान के निर्देश पर गठित जांच दल ने सावारांवा केंद्र का निरीक्षण किया। ऑनलाइन रिकॉर्ड के अनुसार केंद्र में 65,813.60 क्विंटल धान (1,64,534 बोरी) उपलब्ध होना चाहिए था, लेकिन मौके पर केवल 32,975.60 क्विंटल (82,439 बोरी) ही मिला। इस प्रकार 32,838 क्विंटल धान (करीब 82,095 बोरी) गायब पाया गया। समर्थन मूल्य 3100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से यह अंतर लगभग 10 करोड़ 17 लाख रुपये से अधिक का बनता है.
केंद्र में 40,750 खाली बोरी भौतिक रूप से मिलीं
जांच के दौरान समिति प्रबंधक विभु प्रताप सिंह और खरीदी प्रभारी रिजवान खान मौके से गायब मिले। दोनों को सूचना देने के बावजूद वे उपस्थित नहीं हुए और उनके मोबाइल भी बंद पाए गए. एसडब्ल्यूसी विशेषज्ञों और पटवारियों की टीम ने स्टैकवार गिनती कर भारी अंतर की पुष्टि की. अनियमितता केवल धान तक सीमित नहीं रही। केंद्र में 40,750 खाली बोरी भौतिक रूप से मिलीं, जबकि ऑनलाइन रिकॉर्ड में केवल 32,789 बोरी दर्शाई गई थीं. वहीं आवश्यक रजिस्टर और अभिलेख भी उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे पूरे मामले में संदेह और गहरा गया.
प्रशासन ने समिति प्रबंधक को निलंबित कर दिया है, लेकिन इतनी बड़ी अनियमितता के बाद केवल निलंबन पर्याप्त नहीं माना जा रहा. पूर्व में अन्य समितियों में कम मात्रा पाए जाने पर तत्काल एफआईआर दर्ज की गई थी, जबकि इस मामले में देरी दोहरे मापदंड की ओर इशारा करती है.
इस पूरे प्रकरण को लेकर सामाजिक संगठन भी मुखर हो गए हैं. उन्होंने इसे किसानों के हितों से जुड़ा बड़ा आर्थिक अपराध बताते हुए उच्चस्तरीय और स्वतंत्र जांच की मांग की है. साथ ही यह भी कहा गया है कि केवल खरीदी प्रभारी ही नहीं, बल्कि निरीक्षण और निगरानी से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए.
मीडिया में लगातार जिले की विभिन्न समितियों में गड़बड़ियों की खबरें सामने आ रही हैं, लेकिन अभी तक सीमित स्थानों पर ही भौतिक सत्यापन हुआ है. यदि सूरजपुर, भैयाथान, प्रतापपुर, रामानुजनगर, ओड़गी और प्रेमनगर ब्लॉक की सभी समितियों में व्यापक जांच कराई जाए, तो लाखों नहीं बल्कि करोड़ों के घोटाले उजागर होने की आशंका जताई जा रही है.
विशेषज्ञों का मानना है कि राइस मिलरों की भूमिका भी जांच के दायरे में लाई जानी चाहिए. राइस मिलों में तत्काल छापेमार कार्रवाई और भौतिक सत्यापन से बड़े स्तर की गड़बड़ी सामने आ सकती है.
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है, जब कलेक्टर ने एफआईआर के आदेश दे दिए, तो कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई?
यह देरी कहीं न कहीं पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रही है.











