राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला: सवालों के घेरे में बैंक कर्मियों की भूमिका, क्यों खामोश रहा सिस्टम?

अयोध्या में राम मंदिर की दान राशि में कथित हेराफेरी की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस मामले के नए पहलू सामने आ रहे हैं. अब जांच की सुई केवल गणना करने वाले कर्मचारियों या ट्रस्ट से जुड़े लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है. SIT को जांच के दौरान ऐसे संकेत मिले हैं, जिनसे बैंकिंग व्यवस्था की गंभीर चूक और संभावित मिलीभगत की आशंका मजबूत हुई है.

दिलचस्प बात यह है कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष निपेन्द्र मिश्रा भी पहले इस मुद्दे पर सवाल उठा चुके हैं. उन्होंने एक साक्षात्कार में पूछा था कि आखिर दान राशि की गणना और जमा प्रक्रिया में शामिल बैंकिंग तंत्र को अनियमितताओं की भनक क्यों नहीं लगी.

गिनती कक्ष में बैंक की भी थी बराबर जिम्मेदारी

दरअसल दानपात्रों से निकलने वाली नकदी की गणना केवल ट्रस्ट या मंदिर कर्मचारियों की जिम्मेदारी नहीं होती. इस पूरी प्रक्रिया में संबंधित बैंक के अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल रहते हैं. उनकी भूमिका यह सुनिश्चित करने की होती है कि नकदी की गिनती, मिलान और जमा करने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियम के मुताबिक हो.

लेकिन जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जिस तरह लंबे समय तक कथित हेराफेरी चलती रही, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बैंकिंग निगरानी तंत्र आखिर कहां था. अगर गणना के दौरान रकम में अंतर आ रहा था तो उसकी रिपोर्टिंग क्यों नहीं हुई और जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई.

निजी कंपनी के जरिए चल रही थी व्यवस्था

सूत्रों के अनुसार, नकदी गणना का काम बैंक ने एक निजी एजेंसी को सौंप रखा था. यह एजेंसी आउटसोर्सिंग के माध्यम से कर्मचारियों की नियुक्ति करती थी और उन्हें गणना कार्य में लगाती थी. जांच में सामने आया है कि गणना प्रक्रिया में शामिल कई लोगों की नियुक्ति प्रभावशाली लोगों की सिफारिश पर हुई थी. आरोप है कि ट्रस्ट से जुड़े कुछ पदाधिकारियों के रिश्तेदार, परिचित और उनके करीबी लोग भी इस व्यवस्था का हिस्सा बने. ऐसे में गणना प्रक्रिया की निष्पक्षता और निगरानी दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

प्रभाव के आगे बेबस दिखे बैंक अधिकारी

जांच से जुड़े सूत्र बताते हैं कि ट्रस्ट से जुड़े प्रभावशाली पदाधिकारियों की पहुंच और दबदबे के कारण बैंक अधिकारी भी सख्ती से नियम लागू नहीं कर पाए. मंदिर की व्यवस्था से जुड़े निर्णयों पर उनका प्रभाव इतना अधिक था कि बैंक कर्मी अक्सर केवल औपचारिक भूमिका निभाते नजर आए.

कई अधिकारियों को कथित अनियमितताओं की जानकारी होने या संदेह होने के बावजूद उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया. यही वजह है कि अब SIT यह पता लगाने में जुटी है कि यह केवल लापरवाही का मामला था या फिर जानबूझकर आंखें मूंद लेने की रणनीति अपनाई गई थी.

SIT खंगाल रही जिम्मेदारी की पूरी श्रृंखला

जांच एजेंसी अब यह समझने की कोशिश कर रही है कि दान राशि की गिनती से लेकर बैंक में जमा होने तक की पूरी प्रक्रिया में किस स्तर पर चूक हुई. यदि बैंक अधिकारियों की भूमिका केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित रही तो मामला अलग होगा, लेकिन यदि किसी स्तर पर मिलीभगत या संरक्षण के प्रमाण मिले तो जांच का दायरा और बढ़ सकता है.

राम मंदिर दान राशि प्रकरण में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब गिनती कक्ष में ट्रस्ट, बैंक और आउटसोर्सिंग एजेंसी तीनों मौजूद थे, तब कथित हेराफेरी का खेल आखिर इतने लंबे समय तक बिना रोक-टोक कैसे चलता रहा.

बैंक के एक अधिकारी समेत 3 से 4 लोगों की भूमिका संदिग्ध

सूत्रों के मुताबिक, जब ट्रस्ट के कर्मचारी अपनी मनमर्जी से पूरी प्रक्रिया संचालित करते थे तो उसका फायदा कृछ बैंक कर्मियों ने भी उठाया. आशंका है कि कछ कर्मचारी सीधे तौर पर इसमें शामिल रहे हो. वहीं एक बैंक अधिकारी की भी संलिप्तता सामने आ रही है, जो ट्रस्ट के एक पदाधिकारी के घर पर किराए पर रहते हैं. सूत्रों का कहना है कि SIT को इससे संबंधित कुछ साक्ष्य भी मिले हैं, जिनकी तस्दीक की जा रही है. SIT की जांच का अगला चरण इसी सवाल का जवाब तलाशने पर केंद्रित है.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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