मां, मुल्क और मजहब…बंटवारा 1947 की कहानी 2026 में क्या कहती है, कैसी लगी सनी-शबाना की फिल्म?

सनी देओल, प्रीति जिंटा और शबाना आजमी के भावुक कर देने वाले अभिनय से लैस बंटवारा 1947 पर चर्चा फिल्म के आखिरी संवाद से करते हैं. फिल्म खत्म होने वाली होती है, थिएटर में दर्शक उठने लगते हैं- लेकिन बैकग्राउंड से उभरता एक संवाद सुन सबके कदम ठिठक जाते हैं. वह संवाद है- “मां की सेवा से बढ़कर कोई कर्म नहीं, मानवता से बढ़कर कोई धर्म नहीं.” यकीन मानिए साल 2026 के दौर में भी राजकुमार संतोषी के निर्देशन में आई यह फिल्म इस मामले में ज्यादा विचारणीय हो जाती है, जहां मां, मुल्क और मजहब की बातें सबसे ऊपर हैं. डायरेक्टर और राइटर ने ऐसे पहलू का चुनाव किया है, जहां धर्म और मजहब के नाम पर नफरत फैलाने वाले निरुत्तर हो जाते हैं.

यह फिल्म हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक और नाटककार असगर वजाहत के नाटक ‘जिन लाहौर नहीं देख्या’ पर आधारित है. इसमें ‘मां, मुल्क और मजहब’ इन तीन शब्दों को केंद्र में रखकर नफरत की आग सुलगाकर सियासत की रोटी सेंकने वालों को बेनकाब करने का काम किया गया है. कहानी की पृष्ठभूमि में सन् 1947 का भारत-पाक बंटवारा है और उस बंटवारे की आड़ में हिंदू-मुस्लिम के दंगे भी हैं. लेकिन फिल्म केवल हिंदुस्तान-पाकिस्तान में फैले मजहबी उन्माद और कत्लेआम का दारुण चित्रण नहीं करती बल्कि उन लोगों के नापाक इरादों को भी बेपर्दा करती है जिन्हें मुल्क से कहीं ज्यादा प्रॉपर्टी और पॉलिटिक्स से मतलब होता है.

क्या है ‘बंटवारा 1947’ की कहानी?

फिल्म की कहानी मेरठ की पृष्ठभूमि में 14 अगस्त, 1947 से शुरू होती है. आजादी का ऐलान हो चुका है. फिजां में देशभक्ति के जज्बात उमड़ रहे हैं. इसी के साथ मुल्क का बंटवारा भी हो चुका है. पाकिस्तान के हिंदू भारत की ओर भाग रहे हैं और भारत के मुसलमान पाकिस्तान जा रहे हैं. और जो अपना पुश्तैनी घर-बार छोड़कर नहीं जाना चाहते, उन्हें दोनों मुल्कों के नफरती सियासतदां कत्लेआम कर रहे हैं, उनकी प्रोपर्टी पर कब्जा कर रहे हैं, लाचार लोग सीमा पार जाने को मजबूर हो रहे हैं.

मेरठ में ही सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) अपने परिवार और कारखाने के कर्मचारियों के साथ आजादी का जश्न मना रहे हैं. लेकिन तभी दंगाइयों ने उनके घर को निशाना बनाना शुरू कर दिया और लाहौर जाने पर मजबूर दिया. अफरातफरी में बेटा छूट जाता है. असली कहानी इसके बाद शुरू होती है.

गौैरतलब है कि लाहौर ऐसा शहर रहा है जिसे कभी फैशन नगरी कहा जाता था, वह मॉडर्न लाइफ स्टाइल और एजुकेशन से लेकर फिल्मी दुनिया के लकदक तक लिए विख्यात शहर था. रंगीनी और सुख-सुविधाओं को लेकर ही मशहूर कहावत बनी- जिसने लाहौर नहीं देखा वह जन्मा ही नहीं.

लेकिन बंटवारे के बाद जब भारत से तमाम मुस्लिम पाकिस्तान रहने गए तब एक तो उन्हें ‘मोहाजिर’ कहा गया, दूसरे जिन लोगों ने कौम के नाम पर गैर मुसलमानों के साथ ज्यादती की, वे इस्लाम और पाकिस्तान प्रेम से कहीं ज्यादा उनकी प्रॉपर्टी पर कब्जेदारी की पॉलिटिक्स करने में मशगूल हो गए. लाहौर कभी जिन खासियतों के लिए मशहूर रहा, वहां अब मजहबी उन्माद, इस्लाम के नाम पर गैर-मुस्लिमों के साथ ज्यादती करने वाला शहर हो गया. पूरी फिल्म नफरती मिजाज के ऐसे हुजूम पर करारा तंज करती है.

मुस्लिम बने सनी को जब मिली हिंदू बनी शबाना

लाहौर में जब सनी देओल, प्रीति जिंटा, मासूम बेटी (खुशी हजारे) और बाद में उनका खोया बेटा करण देओल भी जिस हवेली में रहना शुरू करते हैं, वह हिंदू बुजुर्ग महिला ‘माई’ यानी शबाना आजमी की है. उसके जीवित रहते ही कंस्टोडियन वाले सिकंदर मिर्जा को यह हवेली अलॉट कर देते हैं. बंटवारे के दंगे में ‘माई’ के बेटे, बहू और मासूम पोती की हत्या हो चुकी है. ऐसे में धीरे-धीरे एक हवेली में सिकंदर का मुस्लिम परिवार और पूजा पाठ करने वाली हिंदू वृद्धा कैसे एक-दूसरे की भावनाओं से जुड़ने लगती हैं, इसका बहुत ही स्वाभाविक चित्रण हुआ है. दूसरी तरफ कट्टरपंथी सियासतदां क्या-क्या साजिशें रचते हैं और सिकंदर मिर्जा से उससे कैसे निपटते हैं- यह जानने के लिए थिएटर का रुख करें.

इस दौरान सनी की बेटी का एक संवाद किसी के भी दिल को छूने वाला है. मासूम लड़की कहती हैं- जब हम एक हवेली में हिंदू माई के साथ हम मुस्लिम एक साथ रह सकते हैं तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान एक-साथ क्यों नहीं कर सकते. तब प्रीति जिंटा कहती हैं- हम सालों एक ही साथ रहे थे लेकिन किसी ने हमारे घर में ही नफरत की आग लगा दी.

फिल्म में ‘मां’ और ‘मानवता’ का जज्बात

बंटवारा 1947 की कहानी में एक समय ऐसा भी मोड़ आता है जब सिकंदर मिर्जा दंगे में मारे गए रतनलाल हौजरी की मां यानी ‘माई’ को अपनी मां की तरह मान लेता है. कट्टरपंथियों की साजिशें झेलते हुए माई के हिंदू-पूजा पाठ और दीवाली के उल्लास में शरीक होता है तब नफरत की बुनियाद पर अपनी सियासत चमकाने वालों को मां और मजहब का असली पाठ पढ़ाता है. वह कहता है- मां की ममता हर मजहब में एक समान होती है और इस्लाम में दूसरे धर्म के लोगों के साथ जुल्म के लिए कोई जगह नहीं होती.

सिकंदर मिर्जा यह भी कहता है- इस्लाम मंदिर तोड़ने की इजाजत नहीं देता. दरिंदे हर कौम में होते है जो इंसानियत के दुश्मन होते हैं, जुल्म करने वालों को अल्लाह पसंद नहीं करते. ऐसे संवादों के जरिए फिल्म में इस्लाम में इमान के महत्व पर रोशनी डाली गई है. बताया गया है कि सियासत करने वाले आखिर धर्म या मजहब के मूल स्वर को क्यों भूल गए हैं?

किस कलाकार ने कैसा किया अभिनय?

अभिनय के मोर्चे पर सनी देओल और प्रीति जिंटा दोनों की जोड़ी काफी गंभीर लगी है. पाकिस्तान के खिलाफ एक्शन बरसाने वाले सनी के चिर परिचित सीन कम ही रखे गए हैं- इस मोर्चे पर डायरेक्टर ने संयम बरता है और यही वजह है कि सनी का किरदार इमोशन के साथ-साथ विचार जगाने वाला भी बन पड़ा है. पूरी फिल्म में सनी छाए हैं. सनी के बेटे करण देओल का रोल छोटा है लेकिन कलाकार ने अपने अभिनय की छाप छोड़ी है.

लेकिन कहानी के केंद्र में सिकंदर मिर्जा के साथ-साथ माई बनी शबाना आजमी ने मानो पूरी महफिल लूट ली. अपने बेटे-बहू और पोती को दंगे में खो देने वाली माई के रोल में शबाना आजमी ने दिल छू लिया, उनकी अदायगी ने आंखों में आंसू ला दिए. शबाना के करियर का यह एक और यादगार किरदार साबित होने वाला है.

इनके अलावा शायर के रोल में अली फजल ने क्या खूब जज्बात जगाया है तो वहीं निगेटिव कैरेक्टर याकूब खान के रोल में अभिमन्यु सिंह काफी दमदार दिखे हैं. हां, इसी के साथ फिल्म में लाहौर के सेट और सिनेमोटोग्राफी की चर्चा भी लाजिमी है जिसने कहानी का ऐतिहासिक माहौल सृजित किया. लेकिन फिल्म में गीत-संगीत अभिनय, कहानी और संवाद के मुकाबले कम ही यादगार साबित होने वाले हैं. जबकि फिल्म में गीतकार जावेद अख्तर हैं तो संगीतकार एआर रहमान.

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पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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