इंदौर की सड़कों की फिर खुलेगी पोल! पहली ही जांच में 19 में से 6 सड़कें फेल, गुणवत्ता पर उठे सवाल ?

सड़क निर्माण की गुणवत्ता को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच इंदौर नगर निगम की पहली थर्ड पार्टी जांच में ही 19 में से 6 सड़कें फेल हो गई हैं। जांच में इन सड़कों की थिकनेस और स्ट्रेंथ मानक से कम पाई गई है। अब इन सड़कों को दोबारा बनाने के निर्देश दिए गए हैं। यह खुलासा ऐसे समय हुआ है, जब शहर में सड़कें बनने के कुछ ही समय बाद उखड़ने, धंसने और खराब होने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।
पहली ही जांच में 32 फीसदी सड़कें फेल!
नगर निगम ने पहली बार शहर की 19 सड़कों की थर्ड पार्टी जांच कराई। जांच में 6 सड़कें गुणवत्ता के मानकों पर खरी नहीं उतर पाईं।यानी जांच के लिए जिन सड़कों के सैंपल लिए गए, उनमें करीब हर तीसरी सड़क में कहीं न कहीं खामी सामने आई।इनमें बिजलपुर और तिलक नगर की सड़कें भी शामिल हैं।नगर निगम ने सभी इंजीनियरों को नोटिस जारी कर संबंधित 228 मीटर सड़क दोबारा बनाने के आदेश दिए हैं।
सड़क बनाने में करोड़ों खर्च, फिर भी गुणवत्ता की ऐसी हालत!
सड़क निर्माण पर नगर निगम हर साल करोड़ों रुपये खर्च करता है। आंकड़ों के मुताबिक पेचवर्क पर भी बड़ी रकम खर्च की गई है।वर्ष 2025-26 में पेचवर्क पर करीब 6 करोड़ रुपये, 2024-25 में 17.40 करोड़ रुपये, 2023-24 में 11.50 करोड़ रुपये और 2022-23 में करीब 40 करोड़ रुपये खर्च किए गए।इसके बावजूद अगर नई सड़कें कुछ समय बाद ही जांच में फेल हो रही हैं तो सवाल सीधे निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर उठता है।
ठेकेदारों की रिपोर्ट पर भरोसा या थर्ड पार्टी जांच जरूरी?
सड़क निर्माण पूरा होने के बाद ठेकेदार की ओर से रिपोर्ट नगर निगम में जमा कराई जाती थी। रिपोर्ट के आधार पर बिल भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती थी।लेकिन अब तक नगर निगम की ओर से कोर कटिंग और गुणवत्ता की जांच नियमित रूप से नहीं कराई जा रही थी, ऐसा रिपोर्ट में सामने आया है।अब निगम ने थर्ड पार्टी जांच शुरू कराई है। सवाल यही है कि अगर यह जांच पहले से नियमित होती तो क्या खराब सड़कें समय रहते पकड़ में नहीं आ सकती थीं?
कम थिकनेस और कमजोर स्ट्रेंथ ने खोली गुणवत्ता की पोल
जांच में कुछ सड़कों की थिकनेस निर्धारित मानक से कम मिली है। कुछ जगह स्ट्रेंथ भी कम पाई गई।वार्ड 1 के संयोजन नगर में थिकनेस के साथ स्ट्रेंथ भी कम मिली। वार्ड 29 में सड़क की थिकनेस मानक से कम पाई गई, जिसके बाद संबंधित इंजीनियर को नोटिस दिया गया।जोन 11 के वार्ड 55 में सड़क का सैंपल फेल हुआ, जिसके बाद सब इंजीनियर और सहायक यंत्री को नोटिस जारी किया गया।वहीं वार्ड 12 में भी थिकनेस और स्ट्रेंथ कम मिली।
एक सड़क का कॉन्स्ट्रक्शन भी सवालों के घेरे में
मां तुंगजा भवानी, देवी कॉन्स्ट्रक्शन और शिवाकिरण कंस्ट्रक्शन ने जिन स्थानों पर काम किया था, उनमें से कुछ जगह गुणवत्ता संबंधी कमियां सामने आई हैं।एक कॉन्स्ट्रक्शन की सड़क में थिकनेस मानक से कम मिली, जबकि उसका बिल नगर निगम से पास हो चुका था। यह स्थिति निगम की गुणवत्ता जांच और बिल भुगतान की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करती है।
‘शिकायतों के बाद अब जागा निगम!’
इंदौर में सड़कों की गुणवत्ता को लेकर लंबे समय से शिकायतें आती रही हैं।इंदौर बायपास के पास लोकेट टर्न चौड़ा कर बनाई गई सड़क की सतह से सीमेंट उखड़ने और उड़ने की शिकायत सामने आई थी।एमआर-11 की सड़क चार-पांच साल पहले बनी थी, लेकिन स्मार्ट सिटी क्षेत्र में बनी सीमेंट-कंक्रीट सड़क में भी दरारें और सतह से मलबा उखड़ने की शिकायतें सामने आईं।खजूरी बाजार की सड़क पर भी परत उखड़ने की शिकायत सामने आ चुकी है।
2024-25 में सड़कों पर 141 करोड़ से ज्यादा खर्च
नगर निगम के आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में सड़कों से जुड़े अलग-अलग कामों पर कुल 141.49 करोड़ रुपये खर्च किए गए।इसमें जोनल सड़कों के सीमेंटीकरण से लेकर लिंक रोड निर्माण, मुख्य मार्गों का निर्माण, डामरीकरण, सड़क सुधार और पेवर ब्लॉक जैसे काम शामिल हैं।इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद भी अगर सड़कों की गुणवत्ता जांच में फेल हो रही है तो जवाबदेही तय करने की मांग और मजबूत होती है।
अब निगम कमिश्नर की नजर, इंजीनियरों को फिर नोटिस
नगर निगम आयुक्त अभय राजनगांवकर के मुताबिक थर्ड पार्टी जांच कराई जा रही है। इंजीनियरों और ठेकेदारों को नोटिस दिए जा रहे हैं और आगे भी नोटिस जारी किए जाएंगे।फिलहाल फेल हुई सड़कों को दोबारा बनाने के निर्देश दिए गए हैं।लेकिन बड़ा सवाल सिर्फ सड़क दोबारा बनाने का नहीं है जब सड़क बनाने में जनता के करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, तो खराब निर्माण की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?क्या सिर्फ सड़क दोबारा बना देने से मामला खत्म हो जाएगा या उस ठेकेदार और जिम्मेदार इंजीनियर पर भी कार्रवाई होगी, जिसकी निगरानी में घटिया सड़क बनी?पहली ही जांच में 19 में से 6 सड़कें फेल होना इंदौर की सड़क व्यवस्था के लिए बड़ा अलार्म है। अब जरूरत सड़क दोबारा बनाने से ज्यादा उस सिस्टम को सुधारने की है, जिसमें सड़क पहले खराब बनती है और उसकी गुणवत्ता बाद में जांच में पकड़ी जाती है।











