डोंगरगढ़ की देवी के नाम पर नई बहस: ब्रिटिश रिकॉर्ड में बगलामुखी, गोंड समाज की परंपरा में दाई बमलाई का जिक्र

डोंगरगढ़, 03 सितम्बर 2026

डोंगरगढ़ की प्रसिद्ध मां बम्लेश्वरी के नाम और इतिहास को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा के नाम से सामने आए एक कथित बयान के बाद गोंड समाज ने आपत्ति जताई है। समाज का कहना है कि देवी को पुरानी परंपरा में ‘दाई बमलाई’ के नाम से जाना जाता था, जबकि बाद में ‘बम्लेश्वरी’ नाम प्रचलित हुआ।

गोंड समाज ने इस कथित बयान को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के विपरीत बताते हुए राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा है। समाज ने मामले में खंडन, स्पष्टीकरण और माफी की मांग की है।

पुस्तक को बताया आधार

गोंड समाज अपनी मान्यता के समर्थन में डॉ. मोतीरावण कंगाली की पुस्तक ‘डोंगरगढ़ की बमलाई दाई बमलेश्वरी’ का भी हवाला दे रहा है। समाज के अनुसार यह मामला केवल देवी के नाम का नहीं, बल्कि उनकी पुरानी सांस्कृतिक पहचान और परंपरा से जुड़ा हुआ है।

हालांकि, इन दावों की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए पुराने प्राथमिक दस्तावेजों और प्रमाणों की जरूरत होगी।

ब्रिटिशकालीन रिकॉर्ड में ‘बगलामुखी’ का उल्लेख

विवाद के बीच करीब 150 साल पुराने ब्रिटिशकालीन रिकॉर्ड का भी उल्लेख सामने आया है। अलेक्जेंडर कनिंघम की 1864 की रिपोर्ट में डोंगरगढ़ का जिक्र मिलता है। रिपोर्ट में बगलामुखी देवी के सम्मान में रविवार को लगने वाले साप्ताहिक बाजार की जानकारी दर्ज होने की बात कही गई है।

इस रिकॉर्ड से इतना जरूर सामने आता है कि उस समय उपलब्ध लिखित दस्तावेज में देवी का संदर्भ बगलामुखी नाम से मिलता है। हालांकि, इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि बगलामुखी नाम से बमलाई और फिर बम्लेश्वरी नाम का संबंध किस तरह बना।

मंदिर की वर्तमान पहचान मां बम्लेश्वरी

वर्तमान में डोंगरगढ़ मंदिर की आधिकारिक पहचान मां बम्लेश्वरी के रूप में है। मंदिर की वेबसाइट के अनुसार पहाड़ी पर स्थित मंदिर मां बम्लेश्वरी का है, जबकि नीचे स्थित मंदिर को छोटी बम्लेश्वरी के नाम से जाना जाता है।

इस तरह तीन अलग-अलग संदर्भ सामने आते हैं—ऐतिहासिक रिकॉर्ड में बगलामुखी, गोंड समाज की परंपरा में दाई बमलाई और वर्तमान धार्मिक पहचान में बम्लेश्वरी।

इतिहास का सच कैसे सामने आएगा?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बगलामुखी, बमलाई और बम्लेश्वरी एक ही देवी के अलग-अलग समय में प्रचलित नाम हैं, या इनके पीछे अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं?

इसका पुख्ता जवाब पुराने राजकीय दस्तावेजों, मंदिर के अभिलेखों, पुरातात्विक प्रमाणों और गोंड समाज की मौखिक परंपराओं के अध्ययन से ही सामने आ सकता है।

फिलहाल उपलब्ध इतिहास, लोकपरंपरा और वर्तमान धार्मिक पहचान में अंतर दिखाई देता है। इसी वजह से डोंगरगढ़ की देवी के नाम और इतिहास को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है।

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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