छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: महिला आयोग कोर्ट नहीं, विकास परियोजना रोकने का अधिकार नहीं

बिलासपुर, 03 सितम्बर 2026 छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य महिला आयोग की शक्तियों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला आयोग एक सलाहकारी और सिफारिशी संस्था है। वह पक्षकारों के अधिकार और दायित्व तय करने वाले न्यायिक आदेश जारी नहीं कर सकता।

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (GAIL) की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य महिला आयोग के तीन आदेशों को निरस्त कर दिया। ये आदेश 19 जून 2025, 6 जुलाई 2026 और 8 जुलाई 2026 को जारी किए गए थे। कोर्ट ने इन्हें आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर माना और GAIL की रिट याचिका स्वीकार कर ली।

गैस पाइपलाइन और मुआवजे को लेकर था विवाद

मामला गैस पाइपलाइन बिछाने और भूमि के मुआवजे से जुड़ा था। GAIL की ओर से हाई कोर्ट में बताया गया कि पेट्रोलियम एवं मिनरल्स पाइपलाइंस (भूमि में उपयोग के अधिकार का अधिग्रहण) अधिनियम, 1962 के तहत संबंधित जमीन पर गैस पाइपलाइन डालने की वैधानिक प्रक्रिया पूरी की गई थी। सक्षम प्राधिकारी द्वारा मुआवजा भी निर्धारित किया जा चुका था।

इसके बावजूद राज्य महिला आयोग ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए मुआवजा बढ़ाने और संबंधित महिला को क्षतिपूर्ति देने के निर्देश दिए। आयोग की ओर से संबंधित अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज कराने और गैस पाइपलाइन बिछाने का काम रोकने का निर्देश भी दिया गया था।

GAIL ने इन आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि महिला आयोग के पास इस तरह के बाध्यकारी आदेश जारी करने का वैधानिक अधिकार नहीं है।

महिला आयोग न्यायिक प्राधिकरण नहीं

हाई कोर्ट ने कहा कि महिला आयोग को मुख्य रूप से सलाह देने और सिफारिश करने की शक्तियां दी गई हैं। आयोग महिलाओं से संबंधित शिकायतों पर संबंधित अधिकारियों के सामने मामला उठा सकता है और उचित कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है।

हालांकि, आयोग पक्षकारों के अधिकार और दायित्व तय नहीं कर सकता और न ही किसी विवाद का न्यायिक तरीके से फैसला कर सकता है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भवानी प्रसाद जेना बनाम ओडिशा राज्य महिला आयोग मामले में दिए फैसले का भी उल्लेख किया। इसमें स्पष्ट किया गया था कि महिला आयोग महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए संबंधित अधिकारियों से उपचारात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है, लेकिन उसे न्यायिक निर्णय देने का अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के एक और फैसले का हवाला

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड कास्ट्स मामले के फैसले का भी उल्लेख किया।

कोर्ट ने कहा कि किसी आयोग को दस्तावेज मंगाने और साक्ष्य लेने की शक्ति मिलने का मतलब यह नहीं है कि वह उन साक्ष्यों के आधार पर बाध्यकारी आदेश जारी कर सकता है। आयोग तथ्यों का पता लगाकर संबंधित सरकार या सक्षम प्राधिकारी को कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है, लेकिन इससे उसे न्यायिक अधिकार हासिल नहीं हो जाता।

आयोग ने पार की अधिकार क्षेत्र की सीमा

हाई कोर्ट ने माना कि इस मामले में महिला आयोग ने अपने आदेशों के जरिए पक्षकारों के अधिकार और दायित्व निर्धारित करने के साथ-साथ ऐसी कार्रवाई के निर्देश दिए, जो सक्षम वैधानिक प्राधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आती है।

कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि आयोग ने अपनी वैधानिक शक्तियों की सीमा पार की है। इसलिए राज्य सरकार या आयोग से जवाब मांगकर मामले को आगे बढ़ाना भी उपयोगी नहीं होगा।

तीनों आदेश निरस्त

हाई कोर्ट ने राज्य महिला आयोग के 19 जून 2025, 6 जुलाई 2026 और 8 जुलाई 2026 के तीनों आदेशों को अधिकार क्षेत्र से बाहर और कानूनन अस्थिर मानते हुए निरस्त कर दिया।

इस फैसले के साथ हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि महिला आयोग शिकायतों पर कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है, लेकिन मुआवजा तय करने, FIR दर्ज कराने या किसी विकास परियोजना का काम रोकने जैसे बाध्यकारी न्यायिक आदेश जारी नहीं कर सकता।

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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