अफगानिस्तान की धरती से निकला कृष्ण-बलराम का प्राचीन प्रमाण, खुदाई में मिले 2000 साल पुराने सिक्कों की कहानी
काबुल
अगर आपसे कहें कि भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की सबसे प्राचीन छवियों में से एक भारत के किसी मंदिर में नहीं, बल्कि हजारों मील दूर अफगानिस्तान की वादियों में, एक विदेशी ग्रीक (यूनानी) राजा के सिक्कों पर मिली है तो क्या आप यकीन करेंगे? सुनने में यह किसी फिल्मी कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन यह इतिहास की वो जीती-जागती हकीकत है जिसने पूरी दुनिया के इतिहासकारों और पुरातत्वविदों को हैरान कर दिया है. आज हम आपको ले चलते हैं 2200 साल पीछे के उस दौर में, जहां ग्रीक और भारतीय संस्कृति का ऐसा मिलन हुआ, जिसकी गवाही आज भी चांदी के ये दुर्लभ सिक्के दे रहे हैं।
ऐ-खानम की खुदाई में वो रहस्यमयी सिक्का
बात 180 ईसा पूर्व के आसपास की है. मध्य एशिया का बैक्ट्रिया (जो आज का अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान का इलाका है), पूरब और पश्चिम के व्यापार और विचारों का सबसे बड़ा चौराहा हुआ करता था. वहां राज करता था एक यूनानी-बैक्ट्रियन राजा अगाथोक्लीज (King Agathocles) .
अफगानिस्तान के ऐ-खानम में जब पुरातत्वविदों ने खुदाई की, तो जमीन के सीने से चांदी के चौकोर सिक्के निकले. जब इतिहासकारों ने इन सिक्कों को साफ करके गौर से देखा, तो उनके होश उड़ गए।
एक तरफ हलधर बलराम: सिक्के के एक पहलू पर एक दिव्य आकृति उकेरी गई थी, जिसके बाएं हाथ में हल और दाएं हाथ में मूसल था. ये कोई और नहीं, बल्कि हमारे हलधर बलराम थे।
दूसरी तरफ चक्रधारी कृष्ण: सिक्के को पलटते ही नजर आए छह तीलियों वाले सुदर्शन चक्र को थामे स्वयं भगवान वासुदेव कृष्ण।
देवी सुभद्रा की भी मौजूदगी: इतना ही नहीं, कुछ सिक्कों पर उनकी बहन देवी सुभद्रा का भी अंकन मिला यानी वही पावन त्रिमूर्ति जिसे आज हम पुरी के जगन्नाथ धाम में पूजते हैं।
यूनानी राजा की भक्ति
राजा अगाथोक्लीज ने इन सिक्कों पर जो कारीगरी करवाई थी, वो उस दौर के सांस्कृतिक तालमेल की सबसे खूबसूरत मिसाल है. सिक्के के एक तरफ ग्रीक भाषा थी, तो दूसरी तरफ आम भारतीय जनमानस की भाषा यानी ब्राह्मी लिपि में प्राकृत. कहीं-कहीं खरोष्ठी लिपि का भी इस्तेमाल हुआ।
भगवान के वस्त्र और मुद्राएं विशुद्ध भारतीय थीं, जबकि उनके सिर का मुकुट और जूते यूनानी प्रभाव दर्शा रहे थे. जरा सोचिए, एक विदेशी शासक अपने राज्य में वैधता और जनता का दिल जीतने के लिए भारतीय देवताओं की शरण में जा रहा था।
कश्मीर से लेकर विदिशा तक जुड़ती कड़ियां
यह कोई इकलौता वाकया नहीं था. इतिहास के पन्ने पलटें तो कई ऐसे सबूत मिलते हैं जो बताते हैं कि कृष्ण-बलराम की भक्ति उस दौर में सीमाओं के पार फैल चुकी थी. प्राचीन व्यापार मार्ग पर स्थित चिलास (कश्मीर) में पत्थरों पर उकेरे गए विशाल चित्र मिले हैं, जहां कुषाण शैली के चोगे पहने दो पुरुष हल और चक्र थामे नजर आते हैं. साथ में खरोष्ठी लिपि में उनके नाम दर्ज हैं।
विदिशा का गरुड़ स्तंभ (मध्य प्रदेश): शुंग काल में आए यूनानी राजदूत हेलियोडोरस ने विदिशा में एक विशाल स्तंभ बनवाया और खुद को गर्व से 'परम भागवत' (वासुदेव कृष्ण का अनन्य भक्त) घोषित किया।
मेगस्थनीज की डायरी: यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने भी अपनी किताब 'इंडिका' में लिखा था कि शूरसेन (मथुरा) के लोग जिस देवता की पूजा करते हैं, वे यूनान के 'हेराक्लीज' जैसे पराक्रमी हैं जो सीधे तौर पर भगवान कृष्ण का ही संदर्भ था।