Barsana Lathmar Holi 2026 : जानें कब से शुरू हुई राधा-कृष्ण की प्रेम परंपरा का ये अनोखा उत्सव

होली के अनेक रंगों की तरह इसे मनाने की परंपराएं भी अलग-अलग स्थानों पर भिन्न हैं। इन्हीं में सबसे प्रसिद्ध है बरसाना की लट्ठमार होली। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा है।

Mathura–Vrindavan क्षेत्र में होली का उत्सव विशेष उल्लास के साथ मनाया जाता है। धुलेंडी से लगभग एक सप्ताह पहले यहां उत्सवों की शुरुआत हो जाती है। पहले दिन लड्डू मार होली और दूसरे दिन लट्ठमार होली खेली जाती है। वर्ष 2026 में 26 फरवरी को बरसाना में लट्ठमार होली मनाई जाएगी।

लट्ठमार होली की शुरुआत कैसे हुई?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बरसाना को Radha का जन्मस्थान माना जाता है। कथा के अनुसार, लट्ठमार होली के दिन Krishna अपने सखाओं के साथ गोकुल से बरसाना आते थे और राधा व उनकी सखियों पर रंग डालकर चंचलता करते थे।

कृष्ण और उनके सखा जब राधा रानी व सखियों को चिढ़ाते, तो नाराज होकर वे उन्हें लाठियों से प्रतीकात्मक रूप से मारती थीं। कृष्ण और उनके सखा इस हंसी-मजाक भरे प्रहार से बचने के लिए इधर-उधर भागते थे। तभी से यह परंपरा “लट्ठमार होली” के रूप में प्रसिद्ध हो गई।

दुनियाभर में प्रसिद्ध है लट्ठमार होली

बरसाना की रंगीली गली में खेली जाने वाली यह होली राधा-कृष्ण प्रेम की प्रतीक मानी जाती है। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु इस अनोखे उत्सव का हिस्सा बनने यहां पहुंचते हैं।

लट्ठमार होली से एक दिन पहले बरसाना के श्रीजी मंदिर में लड्डू मार होली खेली जाती है। यहां की होली केवल अबीर-गुलाल तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों, भजनों और पारंपरिक आयोजनों के साथ एक भव्य उत्सव के रूप में मनाई जाती है।

लट्ठमार होली के अवसर पर लाठी चलाने की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं, जो इस परंपरा को और भी आकर्षक बनाती हैं।

बरसाना की लट्ठमार होली आज न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी अनोखी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जानी जाती है।

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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