रेडियो दिवस विशेष: मीरगंज के ‘कल्लू मिस्त्री’, जिनकी चिट्ठियों के मुरीद थे आकाशवाणी के केंद्र

बरेली : आज ‘विश्व रेडियो दिवस’ है.यह दिन उन आवाजों और यादों को समर्पित है जिन्होंने दशकों तक हमें जोड़े रखा.जब भी बरेली जिले में रेडियो के सुनहरे दौर की चर्चा होती है, तो मीरगंज के रहने वाले कल्लू मिस्त्री का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है. 90 के दशक में कल्लू मिस्त्री रेडियो की दुनिया के एक ऐसे ‘सेलिब्रिटी’ थे, जिनकी पहचान उनकी आवाज से नहीं बल्कि उनके द्वारा लिखी गई चिट्ठियों से थी.

आकाशवाणी के केंद्रों पर चलता था नाम का सिक्का
नब्बे के दशक में मनोरंजन का सबसे सशक्त माध्यम रेडियो ही था। उस दौर में आकाशवाणी रामपुर, बरेली और नजीबाबाद केंद्रों से प्रसारित होने वाले ‘मनचाहे गीत’ और ‘फरमाइशी प्रोग्राम’ खासे लोकप्रिय थे.

कल्लू मिस्त्री बताते हैं कि वह नियमित रूप से इन केंद्रों पर अपनी पसंद के गानों के लिए खत लिखते थे। उनकी दीवानगी का आलम यह था कि शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो जब रेडियो पर उनका नाम न गूंजता हो.

कल्लू मिस्त्री पुरानी यादों को ताजा करते हुए कहते हैं, “उस वक्त सिर्फ मेरा जिला ही नहीं, बल्कि पूरा प्रदेश मेरे नाम से वाकिफ हो गया था.जब रेडियो उद्घोषक ‘मीरगंज से कल्लू मिस्त्री’ का नाम लेकर गाना बजाते थे, तो गर्व से सीना चौड़ा हो जाता था.”
डिजिटल क्रांति और खोता रेडियो का वजूद
समय बदला और 21वीं सदी में डिजिटल क्रांति आई.

मोबाइल और इंटरनेट के दौर ने रेडियो की जगह ले ली। कल्लू मिस्त्री इस बदलाव पर थोड़ा मायूस होकर कहते हैं कि अब देश डिजिटल हो गया है, जिसके कारण रेडियो सुनने वाले लोगों की तादाद में भारी कमी आई है। लोगों के पास अब लंबी चिट्ठियां लिखने और फिर रेडियो पर अपना नाम सुनने के इंतजार का धैर्य नहीं रहा.

सम्मान और आज भी कायम रेडियो से रिश्ता
रेडियो के प्रति उनके इसी निस्वार्थ प्रेम और योगदान के लिए उन्हें आकाशवाणी की ओर से प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया जा चुका है.यह प्रमाण पत्र उनके लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है.आज भी, जब तकनीक ने दुनिया बदल दी है, कल्लू मिस्त्री ने अपना शौक नहीं बदला। वह आज भी अपने खोखे (दुकान) पर रेडियो चालू रखते हैं.

उनके पुराने रेडियो से निकलने वाले गाने आज भी उस दौर की गवाही देते हैं जब रेडियो ही लोगों की दुनिया हुआ करता था. कल्लू मिस्त्री की कहानी हमें याद दिलाती है कि डिजिटल शोर के बीच आज भी कुछ लोग यादों के उस ‘फ्रीक्वेंसी’ पर टिके हुए हैं.

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