दिल्ली में बंद हुआ धंधा तो जयपुर में खोली पटाखे की फैक्ट्री, फिरोज-वसीम के बारूद के काले खेल में कैसे खत्म हो गईं 8 जिंदगियां?

रूह कंपाने वाली और सोचने पर मजबूर कर देने वाली ये कहानी है उन 8 परिवारों की जिन्होंने अपनों को पलभर में हमेशा हमेशा के लिए खो दिया. और इसके पीछे का कारण था एक बेखौफ अवैध कारोबार और सिस्टम की अनदेखी, राजस्थान की राजधानी जयपुर का खोह नागोरियान इलाका मंगलवार की सुबह आम दिनों की तरह ही जाग रहा था. रिहायशी बस्ती की तंग गलियों में चहल-पहल शुरू ही हुई थी कि सुबह के ठीक 11 बजे एक ऐसा जोरदार धमाका हुआ जिसने पूरी धरती को हिलाकर रख दिया. धमाका इतना खौफनाक था कि आसपास के लोग समझ ही नहीं पाए कि भूकंप आया है या कोई आसमानी बिजली गिरी है.

खोह नागोरियान थाने के बिल्कुल पास, राकस्या की ढाणी में स्थित एक साधारण से दो मंजिला मकान से आग की गगनचुंबी लपटें और काला धुआं उठने लगा. यह कोई आम घर नहीं था, बल्कि रिहायशी इलाके के बीचों-बीच चल रहा बारूद का एक एक्टिव ज्वालामुखी था. इस घर के भीतर बिना किसी लाइसेंस, बिना किसी सुरक्षा इंतजाम और बिना पुलिस वेरिफिकेशन के एक अवैध पटाखा फैक्ट्री संचालित हो रही थी.हादसे के वक्त फैक्ट्री में 11 मशीनें धड़धड़ा रही थीं और मजदूर 25-25 किलो बारूद को खोल में भरकर चाइनीज पाइरो (इवेंट और शादियों में इस्तेमाल होने वाले विशेष पटाखे) तैयार कर रहे थे. इसी दौरान बारूद ने आग पकड़ ली और सिलसिलेवार धमाकों के साथ पूरा मकान मलबे और आग के गोले में तब्दील हो गया. आग की तीव्रता इतनी भयानक थी कि भीतर काम कर रहे मजदूरों को बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला. देखते ही देखते एक 15 साल के मासूम बच्चे समेत 8 लोग जिंदा जल गए. उनकी मौत इतनी दर्दनाक थी कि शिनाख्त के वक्त उनके शव पूरी तरह कोयला बन चुके थे.

मृतकों में से छह की पहचान मोहम्मद अशरफ, मोहम्मद रब्बिल, अब्दुल वहीद, समीर खान, बिलाल आजिम और नासीर खान के रूप में हुई है, जबकि दो शव इस कदर जल चुके हैं कि उनकी पहचान करना अब भी प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है.

“हाथ झुलस गए, पर अपनों को खोने का गम है”

घटनास्थल से महज 300 मीटर की दूरी पर रहने वाले आसिफ अंसारी इस खौफनाक मंजर के सबसे पहले गवाह बने. आसिफ बताते हैं- धमाका सुनते ही मैं दौड़ा. फैक्ट्री से आग की लपटें निकल रही थीं. मैंने तुरंत पुलिस को फोन किया. एसएचओ ओमप्रकाश दो पानी के टैंकर लेकर मौके पर पहुंचे. अंदर चीख-पुकार मची थी. मैं और कुछ स्थानीय लोग अपनी जान की परवाह किए बिना धुएं और आग के बीच घर में घुसे. हमने एक बच्चे समेत तीन लोगों को जैसे-जैसे बाहर निकाला. इस कोशिश में मेरे खुद के हाथ भी बुरी तरह झुलस गए. हमें बेहद दुख है कि तमाम कोशिशों के बाद भी हम 8 जिंदगियों को नहीं बचा सके.

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इस पूरी खौफनाक कहानी के पीछे एक बड़ा आपराधिक नेटवर्क काम कर रहा था. जांच में सामने आया है कि यह मकान घाटगेट निवासी दो भाइयों, याकूब और कय्यूम का है. इन्होंने 6 साल पहले इस मकान को दिल्ली के रहने वाले पटाखा निर्माता फिरोज और वसीम को किराए पर दिया था. हैरानी की बात यह है कि इस रिहायशी इलाके में चल रही फैक्ट्री का न तो कोई रेंट एग्रीमेंट था और न ही मकान मालिक ने किराएदारों का पुलिस वेरिफिकेशन कराया था. हद तो यह थी कि एक भाई के नाम पर वैध बिजली कनेक्शन था और उसने दूसरे हिस्से में चल रही अवैध फैक्ट्री को अवैध तरीके से बिजली की सप्लाई दे रखी थी.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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