‘वंदे मातरम न गाने पर कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं’, टीएम कृष्णा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को वंदे मातरम् विवाद पर सुनवाई हुई. इस दौरान शीर्ष अदालत ने कर्नाटक के संगीतकार टीएम कृष्णा की रिट याचिका पर केंद्र सरकार से दो हफ्ते में जवाब तलब किया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम धार्मिक कारणों से वंदे मातरम न गाने वाले व्यक्ति पर आपराधिक कार्रवाई की अपेक्षा नहीं करते. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने कहा कि ‘राष्ट्रीय गीत’ क्या है, यह तय करना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं है. टीएम कृष्णा ने छह पद गाने की अनिवार्यता के खिलाफ याचिका दायर की थी.
SG ने की नोटिस नहीं जारी करने की मांग
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से नोटिस नहीं जारी करने की मांग की और कहा कि यह सेंसेशन को बढ़ावा देने वाला होगा. जस्टिस बागची ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि यह हमारा राष्ट्रीय गीत है. एसजी ने कहा कि दो पद गाए जाएं या छह पद गाए जाएं. यह सरकार से इतर कौन तय करेगा, कोई और तो नहीं कर सकता. याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि लोगों की राय ली जानी चाहिए थी. जस्टिस बागची ने कहा कि यह सही बात है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से दो सप्ताह से जवाब तलब किया.
याचिकाकर्ता ने दिया ये तर्क
टीएम कृष्णा की रिट याचिका में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में 2026 में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. यह चुनौती वंदे मातरम के छह श्लोकों में से आखिरी चार श्लोकों पर है. कृष्णा का तर्क है कि इन श्लोकों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवी-देवताओं का साफ जिक्र है. लोगों को इन्हें गाने के लिए मजबूर करना जबरन धार्मिक और वैचारिक समर्थन है. यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के खिलाफ है.
उनका तर्क है कि ये नियम धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को तोड़ते हैं, जो संविधान का बुनियादी हिस्सा है. याचिकाकर्ता के वकील डॉ. एस. मुरलीधर ने कहा कि संशोधन में ‘राष्ट्रीय गीत’ की साफ परिभाषा नहीं दी गई है. इस अस्पष्टता से इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है. उन्होंने यह भी बताया कि गृह मंत्रालय का ज्ञापन राजपत्र में नहीं छपा है. मुरलीधर ने कहा कि राष्ट्रीय सहमति बनाए बिना ही यह संशोधन जल्दबाजी में पारित कर दिया गया है.











