​डूंगरपुर: प्रशासन की बेरुखी पर भारी पड़ा स्वाभिमान, 5 गांवों के ग्रामीणों ने चंदे से संवार दिया 100 साल पुराना श्मशान घाट

​डूंगरपुर: जहां एक ओर सरकारें ‘विकसित भारत’ का दावा करती हैं, वहीं दूसरी ओर जिले के दोवड़ा पंचायत समिति के ग्राम पंचायत दोवड़ा क्षेत्र में एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो व्यवस्थाओं की पोल खोलती है. अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे 100 साल पुराने क्षेत्रीय श्मशान घाट की सुध जब प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने नहीं ली, तो 5 गांवों के ग्रामीणों ने खुद चंदा इकट्ठा कर इसके कायाकल्प का बीड़ा उठा लिया.
​पूर्व सरपंच सुरमाल परमार ने बताया कि यह श्मशान घाट लगभग एक सदी पुराना है, जिसका उपयोग मसानिया, कांकरी डूंगरी, दोवड़ा, डेरा फला और पायता जैसे आधा दर्जन गांवों की करीब 5,000 की आबादी करती है. वर्ष 1997 में तत्कालीन पंचायत दामड़ी द्वारा यहां टीन शेड और अन्य व्यवस्थाएं की गई थीं, लेकिन समय के साथ देखरेख के अभाव और सड़क ऊंची हो जाने के कारण श्मशान घाट गहरे गड्ढे में तब्दील हो गया. झाड़ियों और गंदगी के कारण यहां अंतिम संस्कार करना भी दूभर हो गया था. उन्होंने बताया कि पंचायत पुनर्गठन से पहले दोवड़ा, दामड़ी पंचायत का हिस्सा था उस वक्त इसका जीर्णोद्धार हुआ था.
​प्रशासन ने नहीं सुनी, तो लोगों ने खुद उठाया बीड़ा
ग्रामीणों ने बताया कि पिछले दस वर्षों से उन्होंने सरपंच कल्पना देवी और पूर्व सरपंच दयाशंकर परमार से श्मशान घाट की मरम्मत के लिए कई बार गुहार लगाई, लेकिन कोई सहयोग नहीं मिला. कई बार पंचायत प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को लिखित और मौखिक रूप से गुहार लगाई, लेकिन हर बार उन्हें केवल खोखले आश्वासन मिले. बाहर से आने वाले मेहमानों द्वारा श्मशान की दुर्दशा पर किए जाने वाले कटाक्षों से आहत होकर ग्रामीणों ने खुद ही समाधान निकालने का फैसला किया. इसके बाद, ग्रामीण कांतिलाल परमार, रामजी परमार, अमरा परमार, नारायण लाल परमार की देखरेख में समाज के लोगों ने तन, मन, धन से सहयोग कर धन संग्रह किया और नए मोक्ष धाम का निर्माण कार्य शुरू किया.
​किसी ने दिया सीमेंट, तो किसी ने दी मजदूरी
​इस पुनीत कार्य के लिए गांव के हर वर्ग ने अपनी क्षमता अनुसार योगदान दिया. किसी ने दो बोरी सीमेंट दी, तो किसी ने पत्थर के ट्रैक्टर भिजवाए. आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीणों ने निर्माण कार्य में शारीरिक श्रम (दिहाड़ी) देकर अपना योगदान दिया. अब तक करीब 3 से 4 लाख रुपये की लागत से टीन शेड और ढांचे का काम पूरा हो चुका है.
​फर्श के लिए अभी भी सहयोग की दरकार
​ग्रामीणों का कहना है कि ऊपर का ढांचा तो जनसहयोग से तैयार हो गया है, लेकिन श्मशान के फर्श का काम और गिट्टी डालना अभी बाकी है. इसके लिए उन्होंने एक बार फिर प्रशासन और ग्राम पंचायत से मदद की अपील की है ताकि इस सार्वजनिक स्थल को पूरी तरह व्यवस्थित किया जा सके. पूर्व सरपंच सुरमाल परमार बोले कि यह हमारे पूर्वजों की जगह है और यहां हमारे क्षेत्र के महान स्वतंत्रता सेनानियों का भी अंतिम संस्कार हुआ है. जब प्रशासन ने हमारी सुध नहीं ली, तो हमने तय किया कि हम चंदा करके इसे खुद बनाएंगे.

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