पीएम मोदी को मिले गिफ्ट की नीलामी में क्या है बुराई- बिजनेसमैन सुहेल सेठ

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर दावा किया गया कि टोक्यो ओलंपिक में नीरज चोपड़ा ने जिस जैवलिन (भाले) से गोल्ड मेडल जीता था उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तोहफे में दिया गया था और बाद में उसे डेढ़ करोड़ रुपए में नीलाम कर दिया गया. इस दावों को लेकर जाने माने भारतीय व्यवसायी, स्तंभकार, लेखक और अभिनेता सुहेल सेठ ने एक लेख लिखा है. उन्होंने इस बात का जिक्र किया है 2014 से पहले किस तरह मिलने वाले तोहफों को इस्तेमाल किया जाता था और उन्हें एक शोकेस में रखने के लिए तमाम जतन किए जाते थे.
उन्होंने कहा कि पिछले वीकेंड की शुरुआत तीखे घटनाक्रम के साथ हुई. उनके सोशल मीडिया फीड पर एक रील दिखी जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री ने नीरज चोपड़ा के दिए हुए जैवलिन की नीलामी करके उसका अपमान किया है. यह दिलचस्प था क्योंकि इसमें उनकी दिलचस्पी के कई विषय जैसे प्रधानमंत्री, नीलामी, राजनीतिक पलटवार और बेशक खेल शामिल थे. जब उन्होंने इस बारे में और गहराई से जाना, तो उन्हें कुछ बहुत दिलचस्प बातें पता चलीं.
सुहेल सेठ ने कहा, ‘मैंने कई दशकों में बहुत से ताकतवर पुरुषों और महिलाओं को तोहफे मिलते देखा है. ऐसी घड़ियां जिन्हें वे कभी-कभी ही पहनते हैं. ऐसी मूर्तियां जिन पर वे कभी धूल भी साफ नहीं करते. कभी-कभार कोई महंगी शॉल ओढ़ ली जाती है. आमतौर पर सत्ता के साथ चीजें एकत्रित करने की एक प्रवृत्ति बन जाती है. गिफ्ट में मिली चीजों को इकट्ठा किया जाता है और उन्हें सजाकर रखने के लिए शोकेस बनवाए जाते हैं. भारत में हमने प्रधानमंत्रियों को तोहफे में मर्सिडीज़ कारें मिलते देखा है, जिन्हें वे गर्व के साथ राजधानी की सड़कों पर चलाते थे.’
नीलामी के पैसों से होते हैं नेक काम
उन्होंने कहा, ‘नरेंद्र मोदी ने इस चलन को तब तोड़ा जब हममें से ज्यादातर लोगों का इस पर ध्यान भी नहीं था और वे पिछले लगभग 25 सालों से ऐसा करते आ रहे हैं, जो अपने आप में लोकतंत्र में एक तरह का रिकॉर्ड है. किसी भी काबिल मुख्यमंत्री की तरह उनके पास भी यादगार तोहफों का ढेर लग जाता था, लेकिन ये तोहफे किसी सरकारी गोदाम में गायब होने के बजाय नीलाम कर दिए जाते थे. उनकी नीलामी होती, उन्हें बेचा जाता और उनसे मिले पैसे को एक ऐसे नेक काम में लगाया जाता जिसे वे अपने घर की शेल्फ पर सजाकर रखने से कहीं ज्यादा जरूरी लड़कियों की शिक्षा को समझते थे.’
2014 के बाद एक नई भावना ‘नमामि गंगे’ की शुरुआत के साथ जुड़ी. गंगा को उसके पुराने, साफ-सुथरे स्वरूप में वापस लाने की सबसे बड़ी कोशिश की गई. इस दौरान प्रधानमंत्री को मिलने वाले तोहफों को नीलाम करने का उद्देश्य मिला. शॉल, तलवारें, मूर्तियां, महान खिलाड़ियों के साइन किए हुए क्रिकेट बैट, ओलंपियनों के जैवलिन और उन चाहने वालों की पेंटिंग जो सिर्फ उनके हाथों में कुछ थमाने के लिए दूर-दूर से आए थे ये सब अब ‘नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट’ पहुंचाए गए. इनकी शुरुआती कीमत मात्र 200 रुपए रखी जाती है और आम भारतीय इन पर बोली लगाते हैं.
नीलामी होना आम बात है
उन्होंने आगे कहा, ‘अब बात करते हैं उस मशहूर जैवलिन की. दुनिया भर में खेल से जुड़ी चीजों की नीलामी होना आम बात है. अगर इससे ज्यादा युवा खेलों की ओर आकर्षित होते हैं, तो इसमें क्या बुराई है? बिना किसी दिखावे या शोर-शराबे के, चुपचाप और सही प्रक्रिया का पालन करते हुए पच्चीस सालों तक मिले उपहारों का सदुपयोग करना कोई दिखावा नहीं है. यह सचमुच सेवा और त्याग के मामले में मोदी की पच्चीस साल लंबी ‘मास्टरक्लास’ है.’











