संभल जामा मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ? सरकार और याचिकाकर्ता ने दिए ये तर्क

संभल जामा मस्जिद विवाद मामले में शाही जामा मस्जिद कमेटी की याचिका पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. याचिका में मस्जिद के सर्वे के लिए स्थानीय अदालत के आदेश को चुनौती दी गई है. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय अदालत के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी. सुनवाई में यूपी सरकार की ओर से पेश हुए ASG केएम नटराज ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार प्राइवेट पार्टियों के बीच के तथ्यों से जुड़े विवादों में नहीं पड़ना चाहती.

उन्होंने कहा कि विवाद का नतीजा चाहे जो भी हो, सरकार पार्टियों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए बाध्य है. इसके बजाय राज्य का ध्यान ‘पूजा स्थल अधिनियम, 1991’ की व्याख्या पर है, उसका कहना है कि इस मुद्दे का असर कई अन्य मामलों पर भी पड़ सकता है.

पूजा स्थल अधिनियम की धारा 3 में क्या है?

केएम नटराज ने अधिनियम की धारा 3 के बारे में बताते हुए कहा कि कानून के तहत रोक खास तौर पर पूजा स्थल को बदलने (कन्वर्जन) के खिलाफ है. उनका कहना है कि धारा 2(b) के तहत कन्वर्जन में किसी भी तरह का बदलाव या परिवर्तन शामिल है. उनका तर्क है कि क्या इस एक्ट के तहत कार्यवाही पर रोक है, यह मामले में दी गई दलीलों और मांगी गई राहत पर निर्भर करेगा.

उन्होंने धारा 3 के तहत ‘धार्मिक संप्रदाय’ के सवाल की ओर भी इशारा किया, जो संविधान पीठ के सामने विचाराधीन है. उनका कहना है कि बड़ा सवाल यह है कि क्या ‘धार्मिक संप्रदाय’ का मतलब पूरे धर्म से है या उसके किसी खास हिस्से से. हालांकि उनका यह भी कहना है कि इस चरण पर इन मुद्दों पर फैसला करने की जरूरत नहीं है.

‘अभी शुरुआती चरण में है संभल का मामला’

केएम नटराज ने कहा कि संभल का मामला अभी शुरुआती चरण में है और इसके लिए सिर्फ एक कमिश्नर नियुक्त किया गया है. उनका तर्क है कि इस चरण में ‘पूजा स्थल अधिनियम’ से जुड़े मुद्दों पर विचार करने की जरूरत नहीं है. ASG ने एक और मामले का जिक्र किया, जिसमें कमिश्नर नियुक्त किया गया था और कहा कि संबंधित मुद्दों पर संबंधित अदालत खुद फैसला कर सकती है. उन्होंने कहा कि इन मुद्दों पर सही समय आने पर विचार किया जा सकता है.

वकील विष्णु शंकर जैन ने क्या कहा?

वहीं, वकील विष्णु शंकर जैन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ (पूजा स्थल अधिनियम) की धारा 4(1) और 4(2) में ऐसे प्रावधान हैं, जो अदालतों में कार्यवाही शुरू करने पर रोक लगाते हैं. उन्होंने धारा 4(2) के प्रावधान को पढ़कर सुनाया और कहा कि 15 अगस्त 1947 के बाद किसी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप में कथित बदलाव से जुड़ी कार्यवाहियों को इस अधिनियम के तहत अलग तरह से देखा जाता है. इसके बाद उन्होंने धारा 4(3)(a) पर बात की, जिसमें प्राचीन स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों से संबंधित कानूनों के तहत संरक्षित स्थानों के लिए छूट दी गई है. उन्होंने कहा कि संभल जामा मस्जिद इस कानूनी छूट के दायरे में आती है.

1920 के नोटिफिकेशन में क्या था?

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की बेंच को बताया कि 18 नवंबर 1920 के एक नोटिफिकेशन के जरिए ‘एन्शिएंट मॉन्यूमेंट्स प्रिजर्वेशन एक्ट, 1904’ के तहत इस स्मारक को संरक्षित घोषित किया गया था. इस नोटिफिकेशन में संरक्षित स्मारकों की सूची में खास तौर पर जुम्मा मस्जिद का जिक्र है और सरकार की मंजूरी के बिना स्मारक या उसके आस-पास तोड़-फोड़, उसे हटाने, उसका रूप बिगाड़ने या कोई निर्माण करने पर रोक लगाई गई है. विष्णु शंकर जैन ने कहा कि 18 नवंबर 1920 के नोटिफिकेशन की पुष्टि बाद में 22 दिसंबर 1920 के एक आदेश से की गई थी.

इसके बाद उन्होंने 1951 और 1958 के प्राचीन स्मारक कानूनों के ज़रिए इस स्मारक से जुड़े कानूनी इतिहास का ब्यौरा भी दिया और तर्क दिया कि बाद के कानूनी नियमों के तहत भी इसे संरक्षण मिलता रहा. उनका कहना है कि यह कानूनी इतिहास यह साबित करने के लिए बहुत जरूरी है कि संभल जामा मस्जिद ‘पूजा स्थल अधिनियम’ के तहत कानूनी छूट के दायरे में आती है.

हाईकोर्ट ने तय किए थे तीन मुद्दे

वकील विष्णु शंकर जैन का कहना है कि हाईकोर्ट ने तीन मुद्दे तय किए थे, जिनमें ‘पूजा स्थल अधिनियम’ का लागू होना और यह सवाल शामिल था कि क्या इस मुकदमे को शुरुआती दौर में ही खत्म कर दिया जाना चाहिए. उनकी चिंता यह है कि अगर सुप्रीम कोर्ट यह तय करता है कि ‘पूजा स्थल अधिनियम’ के तहत यह मुकदमा नहीं चलाया जा सकता या फिर इस मुद्दे को संविधान पीठ के पास भेजता है, तो भी उन्हें यह साबित करना होगा कि यह स्मारक कानूनी छूट के दायरे में क्यों आता है.

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सभी दलीलें सुनने के बाद इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की.

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पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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