भारत में हर 100 में से 2 पुरुष हाउस हस्बैंड: घरेलू कामकाज वाले पति को कोर्ट ने जरूरी क्यों बताया?

घर चलाना, खाना बनाना, बच्चों की देखभाल करना, सफाई करना और परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों का ध्यान रखना- इन कामों को आमतौर पर महिलाओं की जिम्मेदारी मान लिया जाता है. लेकिन, अगर यही जिम्मेदारी पति उठाए और पत्नी नौकरी या बिजनेस पर पूरा ध्यान दे, तो क्या इसे भी नॉर्मल परिवार व्यवस्था माना जा सकता है? मद्रास हाई कोर्ट की एक टिप्पणी ने इसी सवाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए ऐसे पुरुषों की जरूरत है जो घर संभालने की जिम्मेदारी लेने को तैयार हों. यानी अगर पत्नी बाहर काम कर रही है, तो पति का घर और परिवार की जिम्मेदारी संभालना भी उतना ही सामान्य होना चाहिए, जितना किसी महिला का घर संभालना माना जाता है. कोर्ट की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब महिलाओं के लिए घरेलू जिम्मेदारियां रोजगार और करियर के रास्ते में बड़ी चुनौती बनी हुई हैं.
पुरुषों से ज्यादा महिलाएं करती हैं काम
पहले साझा किए गए अध्ययन के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय महिलाएं रोज औसतन 433 मिनट यानी करीब 7.2 घंटे बिना वेतन वाले घरेलू और देखभाल के काम में लगाती हैं. पुरुषों के लिए यह समय करीब 150 मिनट यानी 2.5 घंटे है. यानी महिलाओं का बिना वेतन वाला घरेलू और देखभाल का काम पुरुषों से करीब 2.9 गुना ज्यादा है.
यही वजह है कि ‘हाउस हस्बैंड’ का विचार केवल घर में कौन खाना बनाएगा या बच्चों को कौन संभालेगा, इसका सवाल नहीं है. यह महिलाओं के पास करियर, कमाई, आराम और अपने भविष्य के लिए समय बचाने से भी जुड़ा है.
पति-पत्नी का क्या है आंकड़ा
भारत में कितने पुरुष घर संभालते हैं?
लेबर मिनिस्ट्री के सर्वे के मुताबिक, भारत में करीब 2 फीसदी पुरुष खुद को हाउस हस्बैंड बताते हैं. यानी हर 100 पुरुषों में लगभग 2 पुरुष ऐसे हैं. वहीं, 59 फीसदी महिलाओं ने खुद को हाउस वाइफ बताया है. आंकड़ों का यह अंतर बताता है कि परिवार में घर की जिम्मेदारी आज भी मुख्य रूप से महिलाओं से जुड़ी हुई है.
- 100 पुरुषों में करीब 2 हाउस हस्बैंड हैं.
- 100 महिलाओं में करीब 59 हाउस वाइफ हैं.
- महिलाओं का बिना वेतन वाला घरेलू और देखभाल का काम पुरुषों के मुकाबले करीब 2.9 गुना है.
- महिलाओं के रोज के बिना वेतन वाले काम का औसत समय करीब 7.2 घंटे है.
- पुरुषों का औसत समय करीब 2.5 घंटे है.
मद्रास हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मद्रास हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान महिलाओं के करियर और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच संबंध पर टिप्पणी की. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि समाज में हाउस हस्बैंड होने को कमतर नजर से नहीं देखा जाना चाहिए. अगर कोई पुरुष पत्नी के करियर को आगे बढ़ाने के लिए घर संभालता है, तो इसे भी एक नॉर्मल पारिवारिक व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि अगर महिलाएं घर संभालने के लिए ‘हाउसवाइफ’ बन सकती हैं, तो पुरुष भी ‘हाउस हस्बैंड’ या होममेकर बन सकते हैं. कोर्ट ने बताया कि आज के समय में महिलाएं भी अपने करियर को लेकर सीरियस हैं और कई महिलाएं शादी से इसलिए इनकार करती हैं, क्योंकि वो शादी को करियर में रुकावट मानती हैं. कोर्ट ने ये भी बताया कि भारत में शादी के बिना रहने वाली औरतों की संख्या भी पहले के मुकाबले बढ़ गई है.
करियर पर घर के काम का कितना असर?
घरेलू जिम्मेदारियों का सीधा असर महिलाओं की नौकरी और कमाई पर पड़ता है. अध्ययन के मुताबिक, 15 से 59 साल की काम नहीं करने वाली महिलाओं में 59.6 फीसदी ने घर की जिम्मेदारियों को इसकी मुख्य वजह बताया, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा सिर्फ 2.3 फीसदी है.
यानी कई महिलाओं के लिए घर-परिवार की जिम्मेदारियां नौकरी में बड़ी रुकावट बन जाती हैं. शादी के बाद महिलाओं की कामकाजी भागीदारी 42 फीसदी से घटकर 28 फीसदी रह जाती है. वहीं, 3 साल से छोटे बच्चे की मां बनने पर यह आंकड़ा 19 फीसदी तक पहुंच जाता है. इससे महिलाओं के करियर पर घरेलू जिम्मेदारियों के असर का पता चलता है.
रोज 7 घंटे से ज्यादा घरेलू काम
सिर्फ घरेलू काम की बात करें, तो महिलाएं औसतन 299 मिनट, जबकि पुरुष करीब 97 मिनट देते हैं. महिलाओं के बिना वेतन वाले काम को सिर्फ घर का काम कहकर नजरअंदाज करना आसान है, लेकिन इसमें कई तरह की जिम्मेदारियां शामिल होती हैं-
- खाना बनाना
- घर की सफाई
- कपड़े धोना और इस्त्री करना
- बच्चों की देखभाल
- बुजुर्गों की देखभाल
- परिवार के दूसरे सदस्यों की जरूरतों का ध्यान रखना
सबसे बड़ा अंतर कपड़े धोने और इस्त्री जैसे कपड़ों से जुड़े काम में बताया गया है, जहां महिलाओं का समय पुरुषों से करीब 8.8 गुना है. खाना बनाने में यह अंतर 6.48 गुना और सफाई में करीब 4.60 गुना है.
हाउस हस्बैंड होने से क्या बदलेगा?
अगर पत्नी नौकरी करती है और पति घर संभालता है, तो घर की जिम्मेदारियां अलग तरह से बंट सकती हैं. इससे महिला पर बच्चों, खाना बनाने और घर के बाकी कामों का पूरा बोझ नहीं रहेगा. उसे नौकरी के बाद भी अपने करियर, पढ़ाई, आराम या दूसरे जरूरी कामों के लिए समय मिल सकता है.
केवल 2% हाउस हस्बैंड
समय की कमी भी बड़ी समस्या
अध्ययन में 10.5 घंटे से ज्यादा नौकरी और बिना वेतन वाले घरेलू काम करने वाले लोगों को समय की कमी से जूझने वाला माना गया है. महिलाओं के पास आराम का समय भी कम है. उन्हें रोज औसतन 138 मिनट अपने आराम और पसंद के कामों के लिए मिलते हैं, जबकि पुरुषों को करीब 247 मिनट.
इसके मुताबिक:
- 42.3 फीसदी महिलाएं समय की कमी से जूझ रही हैं.
- पुरुषों में यह आंकड़ा 26.8 फीसदी है.
- 6 साल से छोटे बच्चों वाली शादीशुदा महिलाओं में यह बढ़कर 58.7 फीसदी हो जाता है.
पैसा और भविष्य की बचत पर भी असर
घरेलू और देखभाल की जिम्मेदारियों का असर महिलाओं की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है. ज्यादा देखभाल का काम करने वाली महिलाओं में बैंक खाते के इस्तेमाल, बचत, डिजिटल भुगतान, बीमा और पेंशन जैसी वित्तीय सुविधाओं का इस्तेमाल कम बताया गया है. रोज 6 घंटे से ज्यादा बिना वेतन देखभाल का काम करने वाली महिलाओं में सक्रिय बैंक खाते का इस्तेमाल सिर्फ 41 फीसदी है, जबकि पुरुषों में यह 71 फीसदी है.
विश्लेषण के मुताबिक, ज्यादा जीवनभर देखभाल की जिम्मेदारी वाली महिलाओं ने समान परिस्थितियों वाली महिलाओं की तुलना में 62 फीसदी कम संपत्ति जमा की. इसलिए घर संभालने की जिम्मेदारी को सिर्फ महिलाओं का काम मानने के बजाय पति-पत्नी के बीच बांटना जरूरी है. घर संभालने वाला पुरुष भी परिवार की सामान्य व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है.











