2027 की तैयारी…अखिलेश ने रायबरेली से क्यों फूंका चुनावी बिगुल, कांग्रेस को क्या दिया संकेत?

2027 के विधानसभा चुनाव प्रचार की शुरुआत के लिए अखिलेश यादव ने रायबरेली को ही क्यों चुना? सपा जिस इंडिया गठबंधन का हिस्सा है, उसके शिखर नेता राहुल गांधी का रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र है. रायबरेली और अमेठी की लोकसभा सीटें गांधी परिवार की पर्याय रहीं हैं. लोकसभा चुनाव में सपा इन सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारती, लेकिन विधानसभा चुनाव में तस्वीर दूसरी रहती है.

अखिलेश की रायबरेली से चुनावी शुरुआत कांग्रेस को चुभी है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय का बयान इस ओर इशारा करता है. उन्होंने एक ओर तो यह कहा कि चुनाव है, कोई कहीं जा सकता है और साथ में यह भी जोड़ दिया कि हम भी कन्नौज, सैफई, इटावा जा सकते हैं.

2022 में रायबरेली की 6 में 4 सीटों पर जीती थी सपा

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा रायबरेली की 6 में 4 और अमेठी की 4 में दो सीटों पर जीती थी. दोनों जिलों की कुल 10 विधानसभा सीटों में सिर्फ एक पर कांग्रेस दूसरे स्थान पर थी. 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद 2027 में एक बार फिर कांग्रेस और सपा के गठबंधन में चुनाव लड़ने की अटकलें लग रहीं हैं, लेकिन कांग्रेस सीटों में बड़ी हिस्सेदारी चाहती है.

राज्य के उसके नेता प्रदेश की सभी 403 सीटों पर तैयारी के संदेश भी देते रहते हैं, लेकिन सपा इतनी उदार नहीं दिखती. वो प्रदेश की अपनी राजनीतिक जमीन में कम हिस्सा ही बांटना चाहेगी. रायबरेली में भाजपा अखिलेश के निशाने पर थी, लेकिन उनका चुनावी रथ कांग्रेस को भी याद दिला गया कि वहां राहुल की बड़ी जीत सपा के सहयोग से ही मुमकिन हुई थी.

PDA रथ के लिए अखिलेश ने चुना रायबरेली

2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने अपनी ‘विजय यात्रा’ की शुरुआत कानपुर से की थी. इस बार PDA रथ के लिए उन्होंने रायबरेली चुना. पांच साल के अंतराल में यात्रा का आरंभ-बिंदु बदल गया है और इसके साथ राजनीति का संदर्भ भी. रथ पर निकले अखिलेश यादव ने सिर्फ विपक्षी भाजपा को अपनी तैयारी के संदेश नहीं दिए हैं, बल्कि रायबरेली से शुरुआत कर सहयोगी कांग्रेस को भी याद दिलाई है कि वहां राहुल के सांसद रहते हुए भी सपा बहुत मजबूत स्थिति में है.

राजनीति में किसी अभियान की शुरुआत के स्थान चयन के खास मायने होते हैं. रायबरेली और अमेठी की लोकसभा सीटें गांधी परिवार का पर्याय रहीं हैं. साल 1977 के अपवाद को छोड़कर सभी चुनावों में रायबरेली ने गांधी परिवार के सदस्यों को जीत दिलाई. इन चुनावों में सपा ने गांधी परिवार का समर्थन किया और पार्टी उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा.

क्या यह कांग्रेस के लिए सपा का संदेश?

क्या यह सिर्फ चुनावी कार्यक्रम का हिस्सा है या कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक संदेश भी? इसका जवाब रायबरेली की लोकसभा और विधानसभा राजनीति के फर्क में छिपा है. 2019 में राहुल गांधी अमेठी में स्मृति ईरानी के मुकाबले पराजित हो गए थे. 2024 में सोनिया गांधी ने राहुल के लिए रायबरेली सीट खाली कर दी. अमेठी की उम्मीदवारी अपने परिवार के भरोसेमंद किशोरी लाल शर्मा को सौंपी.

सपा ने पिछले मौकों की तरह इस बार भी दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार न उतार कर गांधी परिवार को रायबरेली में जीत दोहराने और अमेठी में स्मृति ईरानी से हिसाब बराबर करने में सहयोग दिया था. अब कांग्रेस चाहेगी कि इन दोनों क्षेत्रों की 10 विधानसभा सीटों पर 2027 के चुनावों में जीत दर्ज कर वहां गांधी परिवार की पकड़ और लोकप्रियता प्रमाणित करे. क्या इन क्षेत्रों में सपा की मौजूदा ताकत को देखते ऐसा मुमकिन होगा?

रायबरेली, अमेठी में सपा खासी मजबूत

लोकसभा चुनाव में जहां सपा रायबरेली और अमेठी के चुनाव मैदान से दूर रहती है, वहीं विधानसभा चुनाव में मजबूती से लड़ती और जीत दर्ज करती है. 2022 के विधानसभा चुनाव में रायबरेली जिले की छह में चार सीटों पर और अमेठी की चार में दो पर सपा के उम्मीदवार चुनाव जीते थे. गांधी परिवार के गढ़ कहे जाने वाले दोनों जिलों की 10 में केवल एक सीट पर कांग्रेस दूसरे स्थान पर थी. यह अमेठी की जगदीशपुर सीट थी. रायबरेली की किसी सीट पर कांग्रेस का कोई उम्मीदवार मुख्य मुकाबले में नहीं था.

इस चुनाव में रायबरेली की बछरावां (सु.) में श्याम सुंदर भारती (सपा) को 65,747 वोट, लक्ष्मीकांत (अपना दल -एस) को 62,935 और कांग्रेस के सुशील कुमार पासी को 56,835 वोट मिले थे. हरचंदपुर में राहुल राजपूत (सपा) को 92,498 वोट, राकेश सिंह (भाजपा) को 78,009 वोट और कांग्रेस के सुरेंद्र विक्रम सिंह को 16,230 वोट प्राप्त हुए थे. रायबरेली शहर सीट पर अदिति सिंह (भाजपा) को 1,02,429 वोट, राम प्रताप यादव (सपा) को 95,254 और कांग्रेस के डॉ. मनीष सिंह चौहान को 14,954 वोट मिले थे.

सलोन (सु.) में अशोक कोरी (भाजपा) 87,715 वोट, जगदीश प्रसाद (सपा) को 85,604 वोट और कांग्रेस के अर्जुन पासी के वोट 11,439 वोट मिले थे. सरेनी में देवेंद्र प्रताप सिंह (सपा) को 66,166 वोट, धीरेन्द्र बहादुर सिंह (भाजपा) को 62,359 वोट और कांग्रेस की सुधा द्विवेदी को 42,702 वोट मिले थे. ऊंचाहार में मनोज कुमार पांडेय (सपा) को 82,514 वोट और अमरपाल मौर्य (भाजपा) के वोट 75,893 थे, जबकि कांग्रेस के अतुल सिंह को 4 9,985 वोट मिले थे.

अमेठी की तिलोई सीट पर मयंकेश्वर शरण सिंह (भाजपा) को 99,472 वोट, मोहम्मद नईम (सपा) को 71,643 वोट और कांग्रेस के प्रदीप सिंघल को 21,978 वोट मिले थे. इकलौती सीट जहां कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही थी, उस जगदीशपुर (सु) में सुरेश पासी (भाजपा) को 89,315 वोट, विजय पासी (कांग्रेस) को 66,491 वोट प्राप्त हुए थे. गौरीगंज में सपा के राकेश प्रताप सिंह को 79,040 वोट, जबकि भाजपा के चंद्रप्रकाश मिश्र मटियारी को 72,077 वोट मिले थे. तीसरे स्थान पर रहे कांग्रेस के फतेह बहादुर के वोट 28,964 वोट मिले थे. अमेठी में महाराजी प्रजापति (सपा) को 88,217 वोट, डॉक्टर संजय सिंह (भाजपा) को 70,121 वोट और कांग्रेस के आशीष शुक्ला को 14,080 वोट मिले थे.

2024 के गठबंधन ने कांग्रेस को दी राहत

साल 2024 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने सपा के गठबंधन में लड़ा था और 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अकेले मैदान में उतरी थी, लेकिन उसके 399 प्रत्याशियों में सिर्फ सिर्फ दो को ही जीत मिली थी. वहीं, सपा 111 पर जीती थी, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का हौसला बढ़ा. सपा ने उसके लिए सत्रह सीटें छोड़ी थीं. इस चुनाव में प्रदेश की 37 लोकसभा सीटें सपा को और छह कांग्रेस को प्राप्त हुईं थीं.

कांग्रेस के प्रभाव में उत्तर प्रदेश में उसकी दुर्दशा की बड़ी भूमिका रही है. पार्टी लगातार अपनी वापसी के लिए जूझ रही है, लेकिन उसे निराशा हाथ लगी है. साल 1989 से उत्तर प्रदेश की सत्ता से पार्टी बाहर है. केंद्र में वापसी के लिए उत्तर प्रदेश में पार्टी का मजबूत होना जरूरी है. प्रदेश में अकेले पार्टी कोई करिश्मा दिखा नहीं पाती. मजबूत सहयोगी सीटों के बंटवारे के मसले में पिछले विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन का आईना दिखाते हैं. इस हालत से पार्टी कैसे उबरे?

2022 में 399 में 387 ने जमानत गंवाई

संगठन और कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए सभी क्षेत्रों में पार्टी के उम्मीदवार जरूरी होते हैं. तालमेल की दशा में सहयोगी पार्टी ज्यादा पास आने नहीं देती. जब कांग्रेस अकेले मैदान में रही तो उत्तर प्रदेश में उसका प्रदर्शन कैसा रहा? 2022 के विधानसभा चुनाव की कमान प्रियंका गांधी के हाथ में थी. पार्टी ने 399 उम्मीदवार मैदान में उतारे, लेकिन सिर्फ दो जीते और सिर्फ चार सीटों पर पार्टी दूसरे स्थान पर रही, जबकि 387 उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा सके.

वहीं, छह ऐसे उम्मीदवार थे, जो तीसरे या अन्य स्थान पर रहे, लेकिन उनकी जमानत बच गई. क्या कांग्रेस एक बार फिर अपने दम पर विधानसभा चुनाव लड़ना चाहेगी? उसे और सपा दोनों को भाजपा को लगातार तीसरी जीत से रोकने के लिए साथ रहना जरूरी लगता है.

पिछले लोकसभा चुनाव में यह साथ फायदे का था. पेंच कहां फंस रहा है? उत्तर प्रदेश सपा का शक्ति केंद्र है. यहां सपा को असली ताकत कांग्रेस की कमजोरी से हासिल हुई है. भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस मुफीद है, लेकिन कांग्रेस की मजबूती सपा के लिए खतरे की घंटी है, पर फिलहाल सपा की फौरी प्राथमिकता उत्तर प्रदेश की सत्ता है. यकीनन वह कांग्रेस को साथ रखना चाहेगी, लेकिन इसके लिए अपनी राजनीतिक जमीन का कम से कम हिस्सा बांटना चाहेगी. अखिलेश ने रायबरेली से शुरुआत कर सपा की मजबूती के साथ कांग्रेस के सामर्थ्य की सीमाओं का भी संदेश दिया है.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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