सिक्किम हादसा: 21 साल, 8,449 करोड़ रुपए, फिर टनल अधूरी क्यों? यह है पूरी कहानी

सिक्किम के नामची जिले में एक निर्माणाधीन टनल में बड़ा हादसा हुआ है. यह टनल NHPC की तीस्ता स्टेज-VI जलविद्युत परियोजना का हिस्सा है. हादसे वाली जगह सामरदुंग, झोलुंगेय क्षेत्र में है. इस हादसे में अब तक 8 लोगों की मौत हो चुकी है. मौके पर राहत और बचाव कार्य जारी है. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि टनल का यह प्रोजेक्ट क्या है? काम कब शुरू हुआ? कब तक काम पूरा होने की उम्मीद है? इस टनल का उपयोग किस तरीके से होना है? कैसे यह आमजन के काम आने वाली है?
इस परियोजना का पूरा नाम तीस्ता स्टेज-VI हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट है. इसकी स्थापित बिजली क्षमता 500 मेगावाट है. परियोजना का विकास एनएचपीसी कर रही है. एनएचपीसी भारत सरकार की प्रमुख जलविद्युत कंपनी है. परियोजना तीस्ता नदी बेसिन की जल-शक्ति का उपयोग करने के लिए बनाई जा रही है.
यह रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना है. इसका सामान्य अर्थ है कि नदी के बहते पानी को बिजली बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. इसमें बहुत बड़ा जलाशय बनाकर पानी को लंबे समय तक रोकने की योजना नहीं होती. परियोजना का मुख्य क्षेत्र सिक्किम में सिरवानी गांव के पास है. हादसे वाली टनल सामरदुंग-झोलुंगेय क्षेत्र में है. अलग-अलग निर्माण स्थल और प्रवेश मार्ग परियोजना के विभिन्न हिस्सों से जुड़े हैं.
21 साल पहले शुरू हुआ निर्माण
इस परियोजना की शुरुआत वर्ष 2005 में हुई थी. उस समय सिक्किम सरकार ने इसे लैंको तीस्ता हाइड्रो पावर लिमिटेड को दिया था. परियोजना को पहले वर्ष 2012 तक पूरा करने का लक्ष्य था, लेकिन निर्माण काम समय पर पूरा नहीं हो सका. वित्तीय दिक्कतें आईं. वन मंजूरी से जुड़े मुद्दे सामने आए. पहाड़ी भूगर्भ और कमजोर चट्टानी स्थितियां भी चुनौती बनीं. वर्ष 2011 के भूकंप का भी परियोजना पर असर पड़ा. इसके बाद मूल कंपनी वित्तीय संकट में चली गई.
वर्ष 2018 में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू हुई. फिर एनएचपीसी ने परियोजना का अधिग्रहण करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई. मार्च 2019 में केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद एनएचपीसी को अधूरे काम को पूरा करने की जिम्मेदारी मिली. उस समय परियोजना का केवल लगभग 30 प्रतिशत काम पूरा हुआ था. एनएचपीसी ने तब शेष काम के लिए नई योजना और टेंडर प्रक्रिया की जरूरत बताई. इसलिए निर्माण की कहानी दो चरणों में समझी जा सकती है. पहला चरण 2005 में शुरू हुआ. दूसरा चरण एनएचपीसी के हाथ में आने के बाद 2019 से आगे बढ़ा.
बढ़ती जा रही है परियोजना की लागत
परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत 5,748.04 करोड़ रुपये थी. यह अनुमान जुलाई 2018 की कीमतों के आधार पर था. इसमें परियोजना के अधिग्रहण की लागत भी शामिल थी. बाद में लागत बढ़ी. देरी, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, नए निर्माण कार्य, महंगाई और परियोजना से जुड़ी चुनौतियां इसकी वजह हो सकती हैं. दिसंबर 2025 की एक रिपोर्ट में तीस्ता-VI की लागत 8,449 करोड़ रुपये बताई गई. उसी रिपोर्ट में इसे सितंबर 2029 तक चालू करने का लक्ष्य बताया गया है. लागत में आगे बदलाव संभव है. इसका कारण निर्माण की प्रगति, सुरक्षा व्यवस्था, मौसम और हिमालयी भूगर्भीय चुनौतियां हो सकती हैं.
टनल और परियोजना की मुख्य बनावट
परियोजना में तीस्ता नदी पर करीब 26.5 मीटर ऊंचा बैराज बनाया जा रहा है. बैराज पानी के प्रवाह को नियंत्रित करेगा. इसके बाद पानी को सुरंगों के जरिए भूमिगत बिजली घर तक पहुंचाया जाएगा. इस परियोजना में दो मुख्य हेड रेस टनल हैं. दोनों का आकार घोड़े की नाल जैसा है. हर टनल का व्यास करीब 9.8 मीटर है. प्रत्येक की लंबाई करीब 13.76 किलोमीटर है. इन सुरंगों से पानी भूमिगत पावर हाउस तक जाएगा. वहां चार बिजली उत्पादन इकाइयां लगनी हैं. हर इकाई की क्षमता 125 मेगावाट होगी. इस तरह कुल स्थापित क्षमता 500 मेगावाट बनेगी. मार्च 2026 में परियोजना की हेड रेस टनल के कुछ हिस्सों में ब्रेकथ्रू हासिल होने की सूचना थी. ब्रेकथ्रू का अर्थ है कि दो दिशाओं से हो रही खुदाई आपस में मिल गई. यह टनल निर्माण का अहम तकनीकी पड़ाव होता है.
पूरा होने पर क्या सुविधा मिलेगी?
परियोजना पूरी होने पर 500 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता मिलेगी. यह बिजली मुख्य रूप से स्वच्छ ऊर्जा के स्रोत के रूप में देखी जाती है. जलविद्युत परियोजनाओं में कोयला या गैस जलाकर बिजली नहीं बनाई जाती. अनुमान है कि परियोजना एक सामान्य वर्ष में लगभग 2,400 मिलियन यूनिट बिजली पैदा कर सकती है. इससे राष्ट्रीय बिजली ग्रिड को अतिरिक्त बिजली मिलेगी.
पूर्वोत्तर क्षेत्र की ऊर्जा व्यवस्था भी मजबूत हो सकती है. सिक्किम को इस परियोजना से मुफ्त बिजली का हिस्सा मिलेगा. पहले 15 वर्षों के लिए उत्पादन का 12 प्रतिशत हिस्सा राज्य को रॉयल्टी के रूप में मिलने का प्रावधान बताया गया है. इसके बाद यह हिस्सा 15 प्रतिशत हो सकता है. बाकी बिजली बिक्री के लिए उपलब्ध होगी. परियोजना के शुरू होने पर कुछ रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे.
सुरक्षा पर हैं कई बड़े सवाल
हालिया हादसे ने निर्माणाधीन परियोजनाओं में सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं. खासकर हिमालयी राज्यों में बारिश, भूस्खलन, कमजोर चट्टानें और भूमिगत गैस जैसे खतरे गंभीर होते हैं. टनल के भीतर काम करने वाले लोगों के लिए गैस जांच, वेंटिलेशन, आपात निकास, संचार व्यवस्था और बचाव उपकरण बेहद महत्वपूर्ण हैं. नियमित भूगर्भीय अध्ययन भी जरूरी है. हादसे के कारणों की आधिकारिक जांच से ही यह साफ होगा कि टनल के ढहने और गैस की स्थिति के पीछे कौन-से कारक जिम्मेदार थे. फिलहाल यह परियोजना सिक्किम की बड़ी बिजली परियोजनाओं में शामिल है, लेकिन हादसे ने साफ कर दिया है कि निर्माण की गति के साथ मजदूरों की सुरक्षा को भी सबसे ऊपर रखना होगा.
आखिर कैसे हुआ हादसा?
हादसा सोमवार यानी 20 जुलाई को दोपहर में हुआ. क्षेत्र में लगातार बारिश हो रही थी. इसी दौरान पहाड़ी से मलबा और चट्टानें खिसककर टनल के मुहाने पर आ गईं. प्रवेश मार्ग बंद हो गया. अंदर काम कर रहे लोगों का बाहर निकलना मुश्किल हो गया. राहत कार्य को एक और गंभीर समस्या ने कठिन बनाया. अधिकारियों को टनल के भीतर गैस होने की आशंका हुई. कुछ बचाव कर्मियों के अंदर जाने के दौरान चक्कर आने और बेहोश होने जैसी परेशानी हुई. खबरों में कहा गया कि यह गैस जमीन के भीतर की चट्टानी परतों से निकल रही हो सकती है. आशंका है कि भूस्खलन से ये परतें प्रभावित हुई होंगी. बारिश, खराब भू-भाग, सीमित दृश्यता और गैस के खतरे के कारण बचाव कार्य धीमा पड़ा. एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस, दमकल विभाग और जिला प्रशासन की टीमें मौके पर लगाई गईं.











