यात्रा में कांवड़ खंडित होने पर न घबराएं, इन उपायों से भोलेनाथ करेंगे क्षमा

30 जुलाई से पवित्र सावन महीने की शुरुआत हो चुकी है. इस दौरान लाखों भक्त शिवजी को जल चढ़ाने के लिए कांवड़ यात्रा निकालते हैं. कांवड़ यात्रा अत्यधिक नियम, निष्ठा और पवित्रता का प्रतीक है. यात्रा के दौरान यदि किसी भूल, दुर्घटना या स्पर्श के कारण कांवड़ जमीन से छू जाए, टूट जाए या जल अशुद्ध हो जाए तो उसे ‘कांवड़ खंडित होना’ कहा जाता है. ऐसे समय में श्रद्धालुओं को निराश होने या डरने की आवश्यकता नहीं होती है. केवल दिए गए नियमों और उपायों का पालन करके यात्रा को पुनः शुरू किया जा सकता है.

सही जानकारी होने से भक्त बिना किसी मन के बोझ के अपनी यात्रा पूरी कर सकते हैं. आइए जानते हैं कि कांवड़ के खंडित होने पर भक्तों को कौन से जरूरी कदम उठाने चाहिए.

क्षमा याचना और नया पवित्र जल भरना

यदि कांवड़ खंडित हो जाती है तो निराश होने के बजाय तुरंत वहीं रुककर भगवान भोलेनाथ और मां गंगा से अनजाने में हुई भूल की हृदय से क्षमा याचना करें. इसके बाद जल का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है. यदि जल जमीन पर गिर गया है या अशुद्ध हो गया है, तो उस जल को शिवलिंग पर अर्पित न करें. श्रद्धालु को निकटतम पवित्र नदी, गंगा घाट या किसी विश्वस्त जल स्रोत से पुनः नया पवित्र गंगाजल भरना चाहिए. अशुद्ध जल को कभी भी मंदिर तक नहीं ले जाना चाहिए. नया जल भरकर ही आगे की यात्रा की शुरुआत करनी चाहिए. भगवान शिव अपने भक्तों के सच्चे भाव को देखते हैं, इसलिए सच्चे मन से क्षमा मांगकर नया जल भरकर आगे बढ़ना पूरी तरह से सही माना जाता है.

कांवड़ का सही शुद्धिकरण या परिवर्तन करना

यदि कांवड़ का ढांचा टूट गया है तो उसे ठीक कराएं या नई कांवड़ लेकर उस पर गंगाजल छिड़ककर, धूप-दीप दिखाकर दोबारा मंत्रों द्वारा जागृत और शुद्ध करें. टूटी हुई या खराब हुई कांवड़ के साथ आगे बढ़ना सही नहीं माना जाता. इसलिए यदि ढांचा अधिक खराब हो गया हो, तो नई कांवड़ का उपयोग करना ही सबसे अच्छा रहता है. नई कांवड़ लेने के बाद उसे गंगाजल से साफ करें और धूप-दीप दिखाकर फिर से पवित्र करें. इस प्रक्रिया से कांवड़ की शुद्धता वापस आ जाती है. भक्तों को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि बिना शुद्ध किए कांवड़ को आगे न ले जाएं. सही तरीके से शुद्धिकरण करने के बाद ही यात्रा को आगे बढ़ाना शास्त्र सम्मत और सही नियम माना जाता है.

प्रायश्चित संकल्प और पुनः यात्रा का आरंभ

कांवड़ शुद्ध करने के बाद प्रायश्चित संकल्प संगत के वरिष्ठ कांवड़ियों या गुरु की सलाह से 108 बार “ॐ नमः शिवाय” का जप करें, सामर्थ्य अनुसार दान या फल वितरण का संकल्प लें और पुनः श्रद्धापूर्वक यात्रा प्रारंभ करें. मंत्रों का जाप करने से मन शांत होता है और भूल का प्रायश्चित भी हो जाता है. इसके बाद रास्ते में किसी जरूरतमंद को दान या फल देने का मन में विचार करें. शिव भाव के भूखे हैं, सच्ची निष्ठा होने पर वे हर त्रुटि क्षमा कर देते हैं. इसलिए मन में किसी प्रकार का भय न रखें और पूरी भक्ति के साथ अपनी यात्रा पूरी करें. जब आप सच्चे दिल से नियम मानकर आगे बढ़ते हैं, तो महादेव आपकी यात्रा को स्वीकार करते हैं और अपना शुभ आशीर्वाद देते हैं.

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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