कैंसर को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल, राज्यों को दिए अहम निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा, जिन्होंने अभी तक कैंसर को नोटिफाइड डिजीज घोषित नहीं किया है, कि वे ऐसा करने की सिफारिश पर विचार करें. कोर्ट ने देशभर में कैंसर के मामलों की अनिवार्य रिपोर्टिंग के लिए एक समान नीति की जरूरत पर जोर दिया.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ कैंसर को पूरे देश में नोटिफाइड डिजीज घोषित करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी. सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने केंद्र सरकार से पूछा कि देशभर में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य दिशा-निर्देश क्यों नहीं जारी किए जा सकते. उन्होंने कहा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अनिवार्य दिशा-निर्देश क्यों नहीं जारी किए जाते? एक समान नीति होनी चाहिए.
केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने बताया कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है और 17 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में कैंसर को पहले ही नोटिफाइड डिजीज घोषित किया जा चुका है.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संसद की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति की 139वीं रिपोर्ट की सिफारिशों के मद्देनजर 17 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित किया है. कोर्ट ने बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी इन सिफारिशों पर विचार कर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया साथ ही सभी राज्यों/UTs को अनुपालन हलफनामे दाखिल करने को कहा.
समिति ने कहा था कि कैंसर के मामलों और उससे होने वाली मौतों की अनिवार्य रिपोर्टिंग नहीं होने के कारण कैंसर से होने वाली मौतों के आंकड़ों में कमी दर्ज हो सकती है. कई बार मृत्यु का वास्तविक कारण भी सही तरीके से दर्ज नहीं किया जाता और उसे केवल कार्डियो-रेस्पिरेटरी फेल्योर जैसे कारणों के रूप में दर्ज कर दिया जाता है.
समिति ने टाटा मेमोरियल सेंटर के सुझाव से सहमति जताते हुए कहा था कि कैंसर को नोटिफाइड डिजीज बनाने से कैंसर के मामलों और मौतों का एक मजबूत और अधिक सटीक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने में मदद मिलेगी. इससे सरकार को कैंसर के जोखिम कारकों का विश्लेषण, स्क्रीनिंग कार्यक्रमों की बेहतर योजना और कैंसर उपचार के लिए संसाधनों के उचित आवंटन में मदद मिल सकती है.
समिति ने कैंसर के पंजीकरण और रियल-टाइम डेटा संग्रह के लिए CoWIN जैसे वेब पोर्टल के निर्माण तथा मरीजों के लिए काउंसलिंग और सहायता सेवाएं उपलब्ध कराने की भी सिफारिश की थी.
दरअसल नोटिफाइड डिजीज ऐसी बीमारी होती है, जिसके सामने आने पर डॉक्टरों या संबंधित संस्थानों के लिए कानून के तहत सरकारी अधिकारियों को इसकी जानकारी देना अनिवार्य होता है. इस व्यवस्था से सरकार को बीमारी के मामलों का व्यवस्थित आंकड़ा जुटाने, उसके प्रसार पर निगरानी रखने और सार्वजनिक स्वास्थ्य की योजनाएं बनाने में मदद मिलती है.
आमतौर पर यह व्यवस्था टीबी, डेंगू और मलेरिया जैसी संक्रामक बीमारियों के लिए अधिक प्रचलित है. हालांकि कैंसर एक गैर-संचारी बीमारी है, फिर भी संसदीय समिति ने कहा था कि सटीक आंकड़े जुटाने के लिए इसे भी नोटिफाइड डिजीज बनाया जा सकता है.











