‘बेटे-बहू को घर से निकालने का आदेश सही’, SC ने पलटा इलाहाबाद HC का फैसला, जानें मामला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिक अपने बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब असुरक्षा या अपमान नहीं होना चाहिए, हर व्यक्ति को जीवनभर गरिमा के साथ जीने का अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को भी पलट दिया, जिसमें बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने के ट्रिब्यूनल कोर्ट के आदेश को रद्द किया गया था. कोर्ट ने कहा कि बुजुर्गों की गरिमा के लिए ट्रिब्यूनल के पास बच्चों को संपत्ति से निकालने का आदेश देने का अधिकार है.
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि कानून का मकसद बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा तय करना है. सभ्य समाज का स्तर अक्सर इस बात से तय होता है कि वह अपने बुजुर्गों को कितनी गरिमा, सम्मान और सुरक्षा देता है.
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लखनऊ के विकास नगर स्थित एक आवासीय मकान के मालिक रवि कांत गुप्ता द्वारा दायर अपील पर आया है. उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनके बेटे और बहू के खिलाफ पारित बेदखली आदेशों को रद्द कर दिया गया था. मामला तब सामने आया जब रवि कांत गुप्ता की 81 वर्षीय मां को कथित तौर पर जबरन वृद्धाश्रम में भेज दिया गया. इसके बाद रवि कांत ने 5 जून 2022 को जिला मजिस्ट्रेट के सामने 2007 अधिनियम के तहत अपने बेटे को संपत्ति से बेदखल करने की मांग की.
जिला मजिस्ट्रेट ने बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का दिया आदेश
उप-विभागीय मजिस्ट्रेट ने 15 नवंबर 2022 के एक आदेश में पाया कि संपत्ति रवि कांत गुप्ता की स्व-अर्जित संपत्ति थी और यह दर्ज किया कि उनके बेटे ने अपनी दादी को घर में रहने की अनुमति नहीं दी थी और उपद्रव किया था. ऐसे में जिला मजिस्ट्रेट ने बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दिया. जिला मजिस्ट्रेट ने बाद में 9 अगस्त 2023 को अपने आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और उसकी पत्नी को मकान का कब्जा रवि कांत गुप्ता को सौंपने का निर्देश दिया. इसके बाद बेटे और उसकी पत्नी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आदेशों को चुनौती दी.
SC ने हाईकोर्ट के आदेश को किया खारिज
हाईकोर्ट ने पहले के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम के तहत अधिकारियों को बेदखली का आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है. ऐसे में हाईकोर्ट ने एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट के आदेशों को रद्द कर दिया. इसके बाद जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के बेदखली के आदेश में हस्तक्षेप करके गलती की है, क्योंकि यह एक स्थापित कानून है कि ट्रिब्यूनल के पास वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण और संरक्षण के उद्देश्य से बेदखली का आदेश देने का अधिकार है.











