26 साल तक हिंदू महिला को परिवार का हिस्सा मानता रहा पादरी का परिवार, अंतिम विदाई में निभाई हिंदू परंपरा

केरल के एर्नाकुलम जिले के चोत्तानिक्कारा में इंसानियत और आपसी रिश्तों की ऐसी मिसाल देखने को मिली, जिसने धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर अपनापन दिखाया। यहां 88 वर्षीय पार्वती उर्फ पायम्मा के निधन के बाद एक ईसाई पादरी के घर हिंदू रीति-रिवाजों के साथ उनकी अंतिम विदाई की तैयारी की गई। पार्वती करीब 26 वर्षों तक पादरी फादर ओजे जैकब के परिवार के साथ रहीं और समय के साथ परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गई थीं।

26 साल तक परिवार की सदस्य बनकर रहीं

पार्वती ने महज नौ साल की उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया था। इसके बाद उन्होंने कई घरों में घरेलू सहायिका के तौर पर काम किया। वर्ष 2000 में उनकी मुलाकात फादर ओजे जैकब के परिवार से हुई। इसके बाद वह इसी परिवार के साथ जुड़ गईं और करीब 26 वर्षों तक परिवार की देखभाल करती रहीं।

फादर जैकब के मुताबिक, इतने लंबे समय तक साथ रहने के दौरान पार्वती उनके परिवार की सदस्य जैसी बन गई थीं। परिवार के लोग उन्हें प्यार से पायम्मा कहकर बुलाते थे।

पादरी की बेटी को मां की तरह पाला

जब पार्वती जैकब परिवार के साथ आई थीं, उस समय फादर जैकब की पत्नी का निधन हो चुका था। उनकी छह वर्षीय बेटी मेरिन की जिम्मेदारी भी फादर जैकब पर थी। पार्वती ने मेरिन की देखभाल शुरू की और धीरे-धीरे दोनों के बीच मां-बेटी जैसा रिश्ता बन गया।

मेरिन उन्हें प्यार से ‘पायम्मा’ कहकर बुलाने लगीं। पार्वती ने वर्षों तक उनकी परवरिश की। मेरिन की शादी के समय भी पार्वती उनके साथ रहीं और चर्च में मां की भूमिका निभाते हुए विवाह समारोह में शामिल हुईं।

हिंदू रीति-रिवाज से हुई अंतिम विदाई

पार्वती पिछले करीब एक सप्ताह से बीमार थीं और उन्हें पेलिएटिव केयर दी जा रही थी। रविवार रात 88 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। इसके बाद उनके दूर के रिश्तेदारों ने फादर जैकब के घर पर हिंदू परंपरा के अनुसार अंतिम रस्में पूरी कीं।

घर में दीप जलाए गए और हिंदू पुरोहित ने मंत्रोच्चार किया। परिवार ने पार्वती की धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उनकी अंतिम विदाई की व्यवस्था की।

इलाके के बच्चों के लिए भी थीं ‘पायम्मा’

चोत्तानिक्कारा पंचायत सदस्य अलीना जॉर्ज के मुताबिक, पार्वती केवल मेरिन के लिए ही मां जैसी नहीं थीं, बल्कि इलाके के कई बच्चों के साथ भी उनका बेहद स्नेहपूर्ण रिश्ता था। स्थानीय लोग उन्हें पार्वती के बजाय प्यार से ‘पायम्मा’ कहकर बुलाते थे।

उनकी अंतिम विदाई में इलाके की कई लड़कियां भी शामिल हुईं, जिन्हें पार्वती ने बचपन में स्नेह और अपनापन दिया था। उनकी अंतिम यात्रा में जुटी भीड़ ने दिखाया कि वर्षों में बने मानवीय रिश्ते धर्म और खून के रिश्तों की सीमाओं से कहीं आगे होते हैं।

jagjaahir desk

पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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