दीवाली से पहले मिल पाएगा नया वाला ग्रीन पटाखा, 50% प्रदूषण कम करने का दावा, फिर कहां फंसा पेंच?

दीवाली से पहले नया ग्रीन पटाखा बाजार में आने की उम्मीद जगी है, लेकिन इसकी राह में सबसे बड़ा सवाल बेरियम को लेकर है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह ग्रीन पटाखों में बेरियम के इस्तेमाल के नुकसान पर नए सिरे से परीक्षण कराएगी. वजह यह है कि सरकार की दो प्रमुख संस्थाएं आमने-सामने हैं. CSIR-NEERI (नेशनल एनवायरमेंट इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट) ने नई फॉर्मूलेशन को मंजूरी दी है, जबकि CPCB (सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड) ने बेरियम वाले फार्मूले पर आपत्ति जताई है.

केंद्र ने CSIR-NEERI को ऐसे ग्रीन या कम उत्सर्जन वाले पटाखे विकसित करने को कहा था, जिनमें पार्टिकुलेट मैटर यानी PM का उत्सर्जन 50% से ज्यादा घटाने का लक्ष्य था. इसके बाद तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड अमोर्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (TANFAMA) ने नई पीढ़ी की फॉर्मूलेशन तैयार की. इसमें बेरियम साल्ट और नाइट्रेट की मात्रा घटाकर दूसरे ऑक्सीडाइजर इस्तेमाल किए गए हैं.

ग्रीन पटाखे क्या होते हैं?

ग्रीन पटाखे ऐसे पटाखे हैं जिन्हें सामान्य पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाने के लिए तैयार किया जाता है. इनमें ऐसे रासायनिक पदार्थों की मात्रा घटाई जाती है, जो जलने के बाद हवा में PM10 और PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण बढ़ाते हैं. इन पटाखों का उद्देश्य आवाज और रोशनी का प्रभाव बनाए रखते हुए प्रदूषण कम करना है. भारत में CSIR-NEERI इन पटाखों की उत्सर्जन क्षमता की जांच करता है, जबकि मंजूरी की प्रक्रिया में PESO (पेट्रोलियम एंड एक्सप्लेसिव सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन) की भूमिका भी होती है.

नया फॉर्मूला कितना कारगर?

CSIR-NEERI की रिपोर्ट के मुताबिक, इन नई फॉर्मूलेशन से PM10 और PM2.5 के उत्सर्जन में 45% से 60% तक कमी मिली. संस्थान ने फ्लावरपॉट, स्पार्कलर, चकरी, पेंसिल, ट्विंकलिंग स्टार और इनके हाइब्रिड जैसे लाइट-इमिशन पटाखों को कॉमर्शियल प्रोडक्शन के लिए विचार योग्य बताया है. NEERI ने जॉइंटेड क्रैकर्स यानी लड़ी बनाने को भी मंजूरी दी है. ये पटाखे पहले कोर्ट के आदेश से प्रतिबंधित किए गए थे. नई रिपोर्ट में इनसे PM उत्सर्जन में करीब 30% कमी और ठोस कचरे में 32% तक कमी का दावा किया गया है. लेकिन यहीं से विवाद और बड़ा हो गया.

बेरियम के इस्तेमाल के खिलाफ क्यों है CPCB?

CPCB का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने 23 अक्टूबर 2018 के आदेश में पटाखों में बेरियम साल्ट के इस्तेमाल पर रोक लगाई थी. ऐसे में कम मात्रा में भी बेरियम कंपाउंड वाला फॉर्मूला उस आदेश के खिलाफ होगा. CPCB ने यह भी सवाल उठाया कि PM10 और PM2.5 में बताई गई कमी की तुलना उन ग्रीन पटाखों से की गई है या नहीं, जिनमें बेरियम पूरी तरह नहीं होता. बोर्ड के मुताबिक, इस तुलना के बिना नई फॉर्मूलेशन के दावे को पूरा और निर्णायक नहीं माना जा सकता.

यही वजह है कि केंद्र अब नए परीक्षण कराना चाहता है. एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि स्टेकहोल्डर्स से चर्चा के बाद नई जांच नई दिल्ली, भोपाल, कोलकाता और चेन्नई में कराने का फैसला हुआ है. सुप्रीम कोर्ट ने एक्सपर्ट्स से सुझाव लेने को भी कहा है, क्योंकि मामला तकनीकी और वैज्ञानिक जांच से जुड़ा है.

ग्रीन पटाखों का सफर

ग्रीन पटाखों की कहानी नई नहीं है. 2018 में CSIR ने SWAS, SAFAL और STAR जैसी कम प्रदूषण वाली फॉर्मूलेशन पेश की थीं. 2019 में सरकार ने बताया था कि ग्रीन पटाखों के लिए एनिशन टेस्टिंग की सुविधा CSIR-NEERI और मान्यता प्राप्त लैबोरेटरीज में बनाई गई है.

2025 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी ग्रीन पटाखों की निगरानी, नमूनों की जांच और बाजार में सिर्फ मंजूर फॉर्मूलेशन की बिक्री सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया. दिसंबर 2025 में CSIR ने ग्रीन पटाखों के लिए नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस भी शुरू किया. CSIR-NEERI को ग्रीन पटाखों की टेस्ट रिपोर्ट देने वाला प्रमाणन संस्थान बताया गया. सरकार के मुताबिक, ग्रीन पटाखों में PM में करीब 30-40% कमी हासिल की गई थी.

मार्केट में कब तक आएगा नए फार्मूले वाला पटाखा?

यानी नई तकनीक सामने है, लेकिन बाजार तक पहुंचने से पहले वैज्ञानिक और कानूनी मंजूरी की दोहरी परीक्षा अभी बाकी है. पूरी तरह. अगर बेरियम वाली फॉर्मूलेशन पर CPCB की आपत्ति बनी रहती है, तो नए पटाखों की बिक्री से पहले परीक्षण और कानूनी स्थिति साफ करनी होगी. इसलिए दीवाली से पहले नया ग्रीन पटाखा बाजार में कितना और किस रूप में पहुंचेगा, इसका फैसला इन चार शहरों में होने वाली जांच और सुप्रीम कोर्ट के रुख पर निर्भर करेगा.

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पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है।
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