जबलपुर का बंदरकोला गांव बना मिसाल, आधे घरों में बायोगैस प्लांट से बनता है खाना

देश में एलपीजी गैस की किल्लत की खबरों के बीच मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले का बंदरकोला गांव एक अलग उदाहरण पेश कर रहा है। इस गांव के करीब 50 प्रतिशत घरों में बायोगैस प्लांट लगाए गए हैं, जिनकी मदद से रोजमर्रा की रसोई आसानी से चल रही है। इसी वजह से यहां के लोगों को गैस सिलेंडर की कमी की चिंता नहीं रहती।
करीब 250 घरों की इस बस्ती में कई परिवारों ने अपने घरों के पीछे बायोगैस प्लांट स्थापित किए हैं। इन प्लांटों से पाइपलाइन के माध्यम से सीधे रसोई तक गैस पहुंचती है और उसी से खाना बनाया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह व्यवस्था सस्ती होने के साथ लंबे समय तक चलने वाली और पर्यावरण के लिए भी लाभदायक है। गांव में गोबर की पर्याप्त उपलब्धता होने के कारण इन प्लांटों को चलाने में भी किसी तरह की परेशानी नहीं होती।
इस पहल की शुरुआत करीब 15 साल पहले गांव के पूर्व सरपंच अजय सिंह पटेल ने की थी। उन्होंने अपने घर में करीब 12 हजार रुपये की लागत से बायोगैस प्लांट लगाया था। जब लोगों ने इसके फायदे देखे तो धीरे-धीरे अन्य परिवारों ने भी इसे अपनाना शुरू कर दिया और आज गांव के करीब आधे घरों में यह व्यवस्था बन चुकी है।
ग्रामीणों का कहना है कि बायोगैस प्लांट से कई फायदे मिल रहे हैं। इससे घर का पूरा खाना बन जाता है और एलपीजी सिलेंडर पर निर्भरता लगभग खत्म हो जाती है। साथ ही प्लांट से निकलने वाली स्लरी खेतों के लिए बेहतरीन जैविक खाद का काम करती है, जिससे किसानों को रासायनिक खाद पर कम खर्च करना पड़ता है और फसलों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
पर्यावरण की दृष्टि से भी यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बायोगैस के उपयोग से प्रदूषण कम होता है और जैविक खेती को बढ़ावा मिलता है। स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में बेहतर काम के लिए इस गांव को राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
गांव की रहने वाली महिलाओं का कहना है कि बायोगैस प्लांट से सुबह चाय-नाश्ता, बच्चों का टिफिन और दिनभर का खाना आसानी से तैयार हो जाता है। जिन घरों में गायें हैं, वहां गोबर की मदद से गैस बनाई जाती है और उसी से पूरे परिवार का भोजन तैयार होता है।
हालांकि ग्रामीण बताते हैं कि बारिश के मौसम में कभी-कभी गैस उत्पादन थोड़ा कम हो जाता है, लेकिन बाकी समय गांव की रसोई बायोगैस से ही चलती है। करीब ढाई हजार की आबादी वाले इस गांव में बायोगैस अब केवल ईंधन का विकल्प नहीं, बल्कि एक सफल ग्रामीण मॉडल बन चुका है, जो स्थानीय संसाधनों के सही उपयोग से ऊर्जा संकट का समाधान दिखाता है।











