संसद में आदिवासी अधिकारों की गूंज: सांसद राजकुमार रोत ने 26 साल से लंबित ‘मेसा कानून’ को लेकर सरकार को घेरा

डूंगरपुर-बांसवाड़ा सांसद राजकुमार रोत ने संसद के बजट सत्र के दौरान आदिवासियों के संवैधानिक हितों का मुद्दा प्रमुखता से उठाते हुए सरकार को घेरा. नियम 377 के तहत अपनी बात रखते हुए सांसद रोत ने देश के 10 राज्यों में लागू पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में शहरी निकायों के असंवैधानिक विस्तार पर गंभीर चिंता व्यक्त की. उन्होंने दो टूक कहा कि पिछले 26 वर्षों से ‘मेसा’ (नगरपालिका-अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) कानून का लंबित रहना आदिवासी समाज के प्रति सरकारों की गंभीर उपेक्षा और इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है.
संवैधानिक प्रावधानों का दिया हवाला
सांसद रोत ने सदन को याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 244(1) और पाँचवीं अनुसूची आदिवासियों के ऐतिहासिक संघर्ष और बलिदान का परिणाम है. उन्होंने तकनीकी पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि अनुसूचित क्षेत्रों में नगर पालिका, नगर परिषद या शहरी विकास प्राधिकरण (UDA) का गठन सामान्य प्रक्रिया से नहीं किया जा सकता. इसके लिए संसद द्वारा विशेष कानून बनाना अनिवार्य है, ताकि आदिवासियों की विशिष्ट संस्कृति, जमीन और स्वशासन के अधिकार सुरक्षित रह सकें. उन्होंने दुख जताया कि वर्ष 2001 में राज्यसभा में विधेयक पेश होने और 2003 में स्थायी समिति की रिपोर्ट आने के बावजूद आज तक इसे अमलीजामा नहीं पहनाया गया.
शहरीकरण के नाम पर उजाड़े जा रहे आदिवासी परिवार
सांसद ने राष्ट्रीय पार्टियों पर निशाना साधते हुए कहा कि मजबूत आदिवासी नेतृत्व के अभाव के कारण यह कानून ठंडे बस्ते में पड़ा है. इसका सीधा खामियाजा आदिवासी समाज को भुगतना पड़ रहा है. उदयपुर (UDA), डूंगरपुर और बांसवाड़ा जैसे क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि शहरीकरण के नाम पर आदिवासियों की जमीनें छीनी जा रही हैं और उनके आजीविका के साधनों को नष्ट किया जा रहा है बिना कानून के हो रहा यह विस्तार पूरी तरह असंवैधानिक है, जिससे हजारों परिवार विस्थापित होने की कगार पर हैं.
ऐतिहासिक भूल सुधारने की अपील
अपने संबोधन के अंत में राजकुमार रोत ने केंद्र सरकार से मांग की कि वह इस ऐतिहासिक भूल को सुधारे और जल्द से जल्द मेसा कानून को प्रभावी ढंग से लागू करे. उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि समय रहते आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए यह कानून नहीं लाया गया, तो अनुसूचित क्षेत्रों की मूल पहचान और सामाजिक ढांचा पूरी तरह बिखर जाएगा.

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