इंदौर के तालाबों में शुरू होगी ‘फ्लोटिंग फिश फार्मिंग’, जानिए क्या है केज कल्चर?

इंदौर। इंदौर जिले में अब पारंपरिक मछली पालन को तकनीकी रूप देकर ‘केज कल्चर’ (Cage Culture) पद्धति को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे स्थानीय लोगों को स्वरोजगार के नए अवसर मिलेंगे और मत्स्य उत्पादन में भी इजाफा होगा। जिला पंचायत ने इस योजना के लिए यशवंत सागर, बिलावली और चोरल तालाब को चुना है, जहां करीब 200 पिंजरे (फ्लोटिंग जाल) लगाए जाएंगे।
चोरल तालाब में पहले से ही कुछ हिस्सों में केज कल्चर से मछली पालन किया जा रहा है, लेकिन अब इसे और विस्तार दिया जाएगा। वहीं, यशवंत सागर और बिलावली में यह योजना बारिश के मौसम के बाद शुरू की जाएगी।
क्या है केज कल्चर?
‘केज कल्चर’ एक जलीय कृषि पद्धति है, जिसमें मछलियों को जाल से बने पिंजरों में रखा जाता है। ये पिंजरे पानी की सतह पर तैरते रहते हैं और सीमित क्षेत्र में मछलियों को पाला जाता है। इससे प्रमोशन करना, देखभाल और प्रोडक्शन मैनेजमेंट आसान हो जाता है।
- प्रत्येक पिंजरा 12×20 फीट का होगा।
- एक पिंजरे में लगभग 4000 मछलियों के बीज डाले जा सकेंगे।
- इसके लिए कम से कम 20 फीट गहराई जरूरी है और साल भर पानी बना रहना चाहिए।
जरूरी नियम
- तालाब के कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 1% हिस्सा केज कल्चर के लिए उपयोग होगा।
- एक व्यक्ति अधिकतम 18 पिंजरे लगाने की अनुमति ले सकेगा।
- इस योजना में कोई सरकारी अनुदान नहीं मिलेगा।
- एक व्यक्ति को लगभग 3 लाख का खर्च करना होगा। 1.5 लाख पिंजरे के निर्माण में और 1.5 लाख मछली बीज और आहार पर।
केज कल्चर योजना पर काम शुरू
इस योजना के अंतर्गत जिला पंचायत और मत्स्य विभाग मिलकर इन तालाबों में पिंजरे लगाने की अनुमति देंगे। चोरल तालाब पहले से सक्रिय है, लेकिन अब यशवंत सागर और बिलावली तालाब को भी इस तकनीक से जोड़ा जाएगा।
इन तालाबों में सालभर जल उपलब्धता, गहराई और पहुंच की सुविधा को ध्यान में रखते हुए योजना लागू की जा रही है। बारिश के मौसम में जलस्तर बढ़ने के बाद केज कल्चर योजना पर कार्य प्रारंभ होगा।
अधिकारिक जानकारी
डी.एस. सोलंकी (सहायक संचालक, मत्स्य पालन विभाग) के अनुसार, केज कल्चर पद्धति में कोई भी इच्छुक व्यक्ति मछली पालन कर सकता है, लेकिन इसमें किसी प्रकार का अनुदान नहीं दिया जाता है। चोरल के बाद अब यशवंत सागर और बिलावली में भी इस तकनीक को शुरू करने की योजना है।








