बिहार में लीची किसानों के लिए जरूरी सलाह, तुड़ाई के बाद की गई छोटी से गलती घटा देती है पैदावार

लीची की तुड़ाई के बाद बागों के वैज्ञानिक प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। अगले वर्ष बेहतर उत्पादन और गुणवत्तापूर्ण फल प्राप्त करने के लिए लीची बाग का अभी से छंटाई, संतुलित पोषण, सिंचाई और पौध संरक्षण के उपाय अपनाने होंगे।
डा. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के पौध रोग एवं सूत्रकृमि विभागाध्यक्ष डा एस.के. सिंह ने लीची उत्पादक किसानों के लिए विस्तृत परामर्श जारी किया है।
उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में असामान्य गर्मी, लू, अनियमित वर्षा और तापमान में अचानक बदलाव के कारण लीची उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
ऐसे में केवल उर्वरकों का प्रयोग पर्याप्त नहीं है, बल्कि समेकित पोषण प्रबंधन, समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन, जल संरक्षण तथा नियमित बाग निरीक्षण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
प्रो. सिंह ने कहा कि लीची की तुड़ाई फसल का अंत नहीं, बल्कि अगले वर्ष की अच्छी उपज की शुरुआत होती है। तुड़ाई के तुरंत बाद प्रत्येक फल गुच्छे के साथ 15 से 20 सेंटीमीटर शाखा को तेज और स्वच्छ औजार से काट देना चाहिए। इससे जुलाई-अगस्त में स्वस्थ एवं मजबूत नई शाखाएं विकसित होती हैं, जिन पर अगले मौसम में पुष्पक्रम निकलते हैं।
सलाह दी कि सूखी, रोगग्रस्त तथा आपस में रगड़ खाती शाखाओं को हटा देना चाहिए। वृक्ष के मध्य भाग को खुला रखने से धूप और वायु का समुचित संचार बना रहता है।
कटे हुए भागों पर कापर आक्सीक्लोराइड का लेप लगाने से फफूंदजनित संक्रमण से बचाव होता है। सही समय पर की गई छंटाई से फलन बढ़ता है और कीट एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है।
प्रो. सिंह ने बताया कि मुजफ्फरपुर की शाही लीची विश्वभर में प्रसिद्ध है, लेकिन अधिकांश बागानों में संभावित उत्पादन की तुलना में वास्तविक उत्पादन काफी कम है।
इसका प्रमुख कारण तुड़ाई के बाद बागों की उपेक्षा, असंतुलित पोषण, अनियमित छंटाई तथा कीट एवं रोगों का समय पर नियंत्रण नहीं होना है। यदि किसान समय पर सिंचाई, मल्चिंग और वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाएं तो अगले वर्ष फलों की संख्या, आकार, रंग, मिठास और बाजार मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। बाग प्रबंधन बहुत जरूरी है।











