दालों में आत्मनिर्भरता की ओर भारत: केंद्र सरकार ने ‘मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेज़’ को दी मंजूरी, 2030 तक लक्ष्य
वर्तमान में, भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, लेकिन अपनी कुल ज़रूरत का लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। यह योजना इसी आयात पर निर्भरता और संबंधित खर्च को खत्म करने के उद्देश्य से शुरू की गई है।

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने देश को दालों के उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना को हरी झंडी दे दी है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेज़’ नामक नई योजना को मंजूरी दी है, जिस पर 11,440 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। यह मिशन साल 2025-26 से लेकर 2030-31 तक चलेगा, जिसका मुख्य लक्ष्य 2030 तक भारत को दालों के मामले में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।
वर्तमान में, भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, लेकिन अपनी कुल ज़रूरत का लगभग 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। यह योजना इसी आयात पर निर्भरता और संबंधित खर्च को खत्म करने के उद्देश्य से शुरू की गई है।
दाल की खेती का विस्तार और उन्नत बीज:
इस मिशन के तहत दाल की खेती को बढ़ाने के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना बनाई गई है। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक 310 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर दाल की खेती की जाए और कुल उत्पादन को 350 लाख टन तक पहुंचाया जाए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले और मजबूत किस्मों के बीज उपलब्ध कराए जाएंगे। योजना के तहत लगभग 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज और 88 लाख मुफ्त बीज किट किसानों को दिए जाएंगे। इन बीजों को विशेष रूप से ऐसी ज़मीन पर बोने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा जहां अब तक दालों की खेती नहीं होती थी, जैसे धान की परती ज़मीन या अन्य खाली पड़ी भूमि।
बीज की गुणवत्ता और उपलब्धता पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी। इसके लिए ‘SATHI’ नामक एक डिजिटल पोर्टल का उपयोग किया जाएगा। बीज उत्पादन का कार्य केंद्र और राज्य की एजेंसियां मिलकर करेंगी ताकि सुनिश्चित आपूर्ति हो सके।
किसानों को दाम की गारंटी और सरकारी खरीद:
किसानों को फसल के उचित दाम न मिलने के डर से मुक्त करने के लिए, सरकार ने तुअर (अरहर), उड़द और मसूर दालों के लिए अगले चार साल तक 100 प्रतिशत खरीद की गारंटी दी है। इसका अर्थ है कि किसान चाहे जितनी भी उपज करें, NAFED और NCCF जैसी सरकारी एजेंसियां तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर पूरा माल खरीदेंगी। हालांकि, यह खरीद उन्हीं किसानों से होगी जो पहले से पंजीकृत होंगे और सरकारी एजेंसी के साथ समझौता करेंगे। यह कदम किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य सुनिश्चित करेगा और उन्हें दालों की खेती के लिए प्रोत्साहित करेगा। इसके साथ ही, सरकार वैश्विक दालों की कीमतों पर भी नज़र रखेगी ताकि घरेलू बाजार में किसानों को किसी प्रकार का नुकसान न हो।
गांवों में प्रोसेसिंग सेंटर और रोजगार सृजन:
फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को रोकने और दाल की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सरकार 1,000 प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करेगी। इन यूनिट्स में दाल की सफाई, छंटाई और पैकिंग का काम होगा। प्रत्येक यूनिट के लिए सरकार 25 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान करेगी। इन यूनिट्स को गांवों में ही स्थापित किया जाएगा, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा। सरकार का लक्ष्य है कि दालों की खेती कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे देश में फैले, जिससे मौसम या किसी प्राकृतिक आपदा का प्रभाव कम हो सके।
किसानों की बढ़ेगी आमदनी और देश को फायदा:
इस मिशन का प्रभाव केवल दालों के उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी, क्योंकि उन्हें अपनी फसल का उचित मूल्य मिलेगा। दालों की फसलें जमीन को पोषक तत्व प्रदान करती हैं, जिससे मिट्टी का स्वास्थ्य भी सुधरेगा। इसके अलावा, जब देश दालों में आत्मनिर्भर हो जाएगा, तो विदेशी मुद्रा बचेगी क्योंकि आयात की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। सरकार का मानना है कि यह योजना देश की कृषि में एक बड़ा बदलाव लाएगी और आने वाले सालों में इसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे।











