सेशन कोर्ट नहीं दे सकता हत्या के लिए ‘आजीवन कारावस’ की सजा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि हत्या के मामले में किसी आरोपी को दोषी ठहराते समय सत्र अदालत यह निर्देश नहीं दे सकती कि दोषी अपने जीवन के शेष समय तक जेल में रहेगा. यह फैसला इस महत्वपूर्ण कानूनी सवाल से जुड़ा था कि क्या भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 के तहत हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाते समय निचली अदालत यह स्पष्ट कर सकती है कि दोषी को वैधानिक रूप से मिलने वाली सजा में छूट और सजा में परिवर्तन के लाभ के बिना जीवनभर जेल में रहना होगा.
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा, हालांकि, उम्रकैद का अर्थ दोषी के जीवन के बाकी समय तक कारावास है, लेकिन सजा में छूट और सजा में परिवर्तन की वैधानिक शक्तियों को सेशन कोर्ट सीमित नहीं कर सकती. इसलिए, बिना छूट के उम्रकैद की विशेष श्रेणी की सजा देने का अधिकार संवैधानिक अदालतों के पास है, सेशन कोर्ट के पास नहीं.
सजा में छूट और परिवर्तन की शक्ति
पीठ ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता के तहत सजा में छूट और सजा में परिवर्तन की शक्ति को सेशन कोर्ट सीमित नहीं कर सकती. पीठ ने कहा कि सेशन कोर्ट द्वारा उम्रकैद की सजा को दोषी के जीवन के अंत तक जारी रखने का निर्देश वैधानिक व्यवस्था के विपरीत है. मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए पीठ ने एक तिहरे हत्याकांड में एक व्यक्ति और एक अन्य दोषी की दोषसिद्धि बरकरार रखी. हालांकि, जीवन के शेष समय तक कारावास की सजा को बदलकर 25 साल के कठोर कारावास में तब्दील कर दिया गया.
25 साल के कठोर कारावास की सजा
साल 2014 में सेशन कोर्ट ने दोषियों को उम्रकैद के साथ-साथ ‘शेष जीवन जेल में बिताने. का निर्देश दिया था, जिसे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 2022 में बरकरार रखा था. सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की हत्या (आइपीसी की धारा 302) के तहत दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, लेकिन ट्रायल कोर्ट के उस निर्देश को खारिज कर दिया जिसमें आजीवन कारावास को प्राकृतिक जीवन तक सीमित किया गया था. कोर्ट ने इसके स्थान पर दोनों दोषियों को 25 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई, जिसमें वैधानिक छूट का लाभ नहीं मिलेगा. सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से आपराधिक न्याय प्रणाली में ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र की सीमाएं और स्पष्ट हो गई हैं.











